आलोक वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, सीबीआई निदेशक बने रहेंगे, नीतिगत फैसला करने की मनाही

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार के फैसले को मंगलवार को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद पर बहाल कर दिया है।
अपने 44 पेजों के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टाबलिशमेंट एक्ट के तहत उच्चाधिकार कमेटी एक हफ्ते में उनके मामले पर फैसला करे। उच्चाधिकार कमेटी के अंतिम फैसला आने तक आलोक वर्मा कोई नीतिगत फैसला नहीं लेंगे।
आज फैसला सुनाने के दिन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई छुट्टी पर थे जिसकी वजह से ये फैसला कोर्ट नंबर एक की बजाय कोर्ट नंबर 12 में जस्टिस संजय किशन कौल ने सुनाया । सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 6 दिसंबर को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टाबलिशमेंट एक्ट के तहत उच्चाधिकार कमेटी में प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और चीफ जस्टिस शामिल हैं। इस कमेटी को एक हफ्ते के अंदर आलोक वर्मा पर फैसला करना है लेकिन तब तक कोई नीतिगत फैसला आलोक वर्मा नहीं ले सकते हैं। वे रुटीन मामलों को देख सकते हैं। गौरतलब है कि वर्मा 31 जनवरी को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में अगर उच्चाधिकार कमेटी कोई फैसला भी लेती है तो किसी भी मामले पर फैसला करने के लिए वर्मा को महज दो हफ्ते का ही समय मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई निदेशक को ट्रांसफर पर भेजा जाना छुट्टी के समान नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए बनी उच्चाधिकार कमेटी की मंजूरी के बिना ट्रांसफर कानून के खिलाफ है। संस्थान का मुखिया एक रोल मॉडल होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के पहले उच्चाधिकार समिति से पूर्व अनुमति के बिना सीबीआई डायरेक्टर को उनके अधिकार से वंचित करने का कोई प्रावधान नहीं है।
23 अक्टूबर, 2018 को सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को केंद्र सरकार ने जबरन छुट्टी पर भेज दिया था। दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।
केंद्र सरकार ने दोनों को छुट्टी पर भेजने के साथ ही सीबीआई के ज्वायंट डायरेक्टर एम नागेश्वर राव को सीबीआई के निदेशक का अस्थायी कार्यभार सौंपा था। आज सुप्रीम कोर्ट ने एम नागेश्वर राव को अस्थायी कार्यभार सौंपने के केंद्र के आदेश को भी निरस्त कर दिया ।
मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि दो आला अधिकारियों का झगड़ा रातों रात सामने नहीं आया। ऐसा जुलाई से चल रहा था। उन्हें आधिकारिक काम से हटाने से पहले चयन समिति से बात करने में क्या दिक्कत थी ? 23 अक्टूबर को अचानक फैसला क्यों लिया गया?
चीफ जस्टिस ने कहा था कि आलोक वर्मा के वकील नरीमन का कहना है कि सीबीआई निदेशक को दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टाबलिशमेंट एक्ट में दिए गए प्रावधानों के तहत तबादला या पद से हटाने की कार्रवाई दो साल से पहले नहीं की जा सकती। फिर प्रधानमंत्री वाले पैनल में ये मसला सीवीसी ने क्यों नहीं रखा? चीफ जस्टिस ने कहा था कि दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टाबलिशमेंट एक्ट की धारा 4 (1) सीवीसी को सीबीआई के काम को कंट्रोल करने का अधिकार देता है परंतु सीबीआई पर सीवीसी की निगरानी भ्रष्टाचार के मामलों में नहीं है। क्या सीवीसी एक्ट का सेक्शन 8 दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टाबलिशमेंट एक्ट के सेक्शन 4 से ऊपर है? तब तुषार मेहता ने कहा था कि मान लीजिए, रिश्वत लेने वाले एक अधिकारी को कैमरे पर पकड़ा जाता है और उसे तत्काल निलंबित करने की जरूरत होती है, तो क्या उस अधिकारी को सरकार द्वारा बनाए रखा जाता है। उन्होंने कहा था कि दो वरिष्ठ अधिकारी एक दूसरे के खिलाफ काम कर रहे थे। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ न केवल जांच कर रहे थे बल्कि एक दूसरे पर छापेमारी भी कर रहे थे और केस दर्ज कर दिए थे।
आलोक वर्मा के वकील फाली एस नरीमन ने कहा था कि ये ऐसी पोस्ट नहीं है जो केवल आपके विजिटिंग कार्ड पर लिखी हो। निदेशक को छुट्टी पर भेजने के बाद सरकार के लिए यह कहना काफी नहीं है कि आलोक वर्मा अभी भी निदेशक हैं। तब चीफ जस्टिस ने पूछा था कि क्या यहां कोई कार्यकारी सीबीआई निदेशक नहीं हो सकता? तब नरीमन ने कहा कि नहीं । चीफ जस्टिस ने पूछा था कि अगर कोई विशेष परिस्थिति आ जाए तो क्या कोर्ट सीबीआई निदेशक नियुक्त कर सकता है? तब नरीमन ने कहा कि हां, अगर सुप्रीम कोर्ट अपनी असीम शक्तियों का प्रयोग करे तो।

कॉमन कॉज की ओर से दुष्यंत दवे ने कहा था कि सीवीसी को भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर केवल निगरानी का अधिकार है। सीवीसी के पास सीबीआई निदेशक बदलने का अधिकार नहीं है। दवे ने कहा कि आलोक वर्मा को जिस तरह से हटाया गया है, उससे सरकार उस समिति पर सवाल उठा रही है, जिसका हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस भी हैं। तब चीफ जस्टिस ने दवे से पूछा था कि क्या आप लोगों की दलील का मतलब ये है कि सीबीआई निदेशक को छुआ ही नहीं जा सकता ? किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती ? अगर ऐसा है तो संसद ने कानून बनाते वक्त ऐसा स्पष्ट क्यों नहीं लिखा ?
मल्लिकार्जुन खड़गे की तरफ से कपिल सिब्बल ने कहा था कि सीवीसी एक्ट के मूल में यह है कि उसे केवल और केवल भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सीबीआई की निगरानी का अधिकार है। सिब्बल ने कहा था कि सीबीआई आरुषि जैसे अन्य केसों की भी जांच करती है। तब चीफ जस्टिस ने कहा था कि सीबीआई उन केसों में भी जांच करती है, जिनमें कोर्ट जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद जांच करने का आदेश देती है। सिब्बल ने कहा था कि यहां तबादले का सीधा अर्थ यह है कि सीबीआई निदेशक की मंशा पर आपको संदेह है। इसीलिए विधायिका ने कानून में प्रावधान किया है कि बिना प्रधानमंत्री वाले पैनल की मंजूरी के यह संभव नहीं हो सकता। चयन समिति की मंजूरी जरूरी है।

 

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