शरद संगम में शक्ति संचार व्यायाम, हं-सः एवं ओम प्रविधि का भक्तों ने लिया लाभ

रांची। शरद संगम में शक्ति संचार व्यायाम, हं-सः प्रविधि तथा ओम प्रविधि से भी भक्तों का साक्षात्कार कराया गया। उन्हें बताया गया कि योगदा के प्रत्येक साधकों को इन तीनों विधाओं में पारंगत होना उतना ही आवश्यक है, जितना प्रत्येक प्राणियों को जीवित रखने के लिए भोजन, पानी और हवा की आवश्यकता है। शरद संगम में भाग ले रहे साधकों-भक्तों को प्रशिक्षित कर रहे ब्रह्मचारी शीलानन्द एवं ब्रह्मचारी निष्ठानन्द ने स्पष्ट रुप से कहा कि जब तक आप इन तीनों विधाओं में एकाग्रता को नहीं लायेंगे, ईश्वर की अनुभूति होना संभव नहीं है। ब्रह्मचारीद्वय का कहना था कि ये तीनों तकनीक जिन्होंने ही अपनाये, उन्हें पता चल गया कि यह ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कितना आवश्यक है। योगदा के साधकों के लिए इन सरल तकनीकों को स्वयं परमहंस योगानन्द जी ने सहजता से प्रस्तुत किया ताकि योगदा के साधक/भक्त स्वयं को दिव्य प्रकाश से आलोकित कर सकें. तथा वे परम आनन्द को प्राप्त कर सकें। इन्होंने यह भी कहा कि मन को एकाग्र कर जब आप इन तीनों विधाओं में पांरगत हो जाते हैं तो आप स्वयं महसूस करेंगे कि आपने क्या पाया हैं? ब्रह्मचारी शीलानन्द का कहना था कि हमें नहीं भूलना चाहिए कि प्राणशक्ति आने का रास्ता मेड्यूला है, और यही प्राणशक्ति हमें जीवित रखती है। उन्होंने कहा कि जब हम शारीरिक या मानसिक श्रम करते है तो उर्जा का ह्रास होता है, और इसे पुनः रिचार्ज करने का काम शक्ति संचार व्यायाम करता है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर व्यायामों में आप देखेंगे कि लोग व्यायाम करने के बाद थक जाते है, पर केवल योगदा के तकनीक वाली शक्ति संचार व्यायाम ही ऐसी है, जिसमें आप थकते नहीं बल्कि और ऊर्जान्वित हो जाते हैं। शीलानन्द ने कहा कि व्यायाम हमेशा खूले में, आंखे बंद कर, कूटस्थ पर ध्यान देते हुए करें, यदि शरीर के किसी अंग में कष्ट हो तो उस व्यायाम को आप मानसिक तौर पर करें। इधर ब्रह्माचारी निष्ठानन्द ने हं-सः प्रविधि के बारे में बताते हुए कहा कि ध्यान के लिए हं-सः-प्रविधि बहुत ही आवश्यक है। मन को एकाग्र करने के लिए भी ये प्रविधि बहुत जरुरी है।

उन्होंने कहा कि हं-सः प्रविधि के नियमित अभ्यास से आप में एकाग्रता आती है, और बिना एकाग्रता के आप कुछ भी नहीं कर सकते, यहां तो ध्यान की बात हो रही है। इस प्रविधि में हम सामान्य सांसों को जो ले रहे और छोड़ रहे होते है, सिर्फ उसका अवलोकन करना होता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है। उन्होंने कहा कि आपके द्वारा हं-सः प्रविधि सही हो रहा या नहीं, उसकी पहचान बहुत ही सरल है. जब आप हं-सः प्रविधि करने के बाद स्वयं को गहरी शांति में, मन को तीक्ष्ण और मन-मस्तिष्क में स्वच्छता का अनुभव कर रहे हैं तो समझ लीजिये कि आप सही मार्ग पर हैं। दुसरी ओर ओम प्रविधि के बारे में बताते हुए ब्रह्मचारी आलोकानन्द ने कहा कि ऊं प्रेरणादायी है, उत्साहवर्द्धक है, इसे जान लेने पर कुछ नहीं बच पाता, क्योंकि यह सृष्टि की सबसे पहली ब्रह्माण्डीय ध्वनि है, जिसे सुनने के लिए योगियों-ऋषियों का समूह सदैव लालायित रहता है। इसी ब्रह्माण्डीय ध्वनि को जनसामान्य तक सुनाने के लिए परमहंस योगानन्द जी ने योगदा के साधकों के लिए ओम प्रविधि के वैज्ञानिक तरीके को हम सभी के बीच में रखा, जिसका लाभ आज सभी उठा रहे हैं।

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