व्यंग्य: पंच महाराज

-बालकृष्ण भट्ट-

माथे पर तिलक, पांव में बूट चपकन और पायजामा के एवज में कोट और पैंट पहने हुए पंच जी को आते देख मैं बड़े भ्रम में आया कि इन्हेंट मैं क्याप समझूं पंडित या बाबू या लाला या क्या ? मैंने विचारा इस समय हिकमत अमली बिना काम में लाए कुछ निश्चंय न होगा, बोला-पालागन, प्रणाम्, बंदगी, सलाम, गुडमार्निंग पंच महाराज-

पंच-न-न-नमस्काधर नमस्काुर-पु-पु-पुरस्कांर-परिस्कारर

मैंने कहा-मैं एक बात पूछना चाहता हूं बताइएगा-

पंच-हां-हां पू-पू पूछो ना-ब-बताऊंगा, क्यों नहीं।

आप अपने नाम का परिचय मुझे दीजिए जिससे मैं आपको जान सकूं कि आप कौन हैं-

पंच-प-प-परिचय क्या ह-ह हमतो कु-कुलीन हैं न!

मैं अचरज में आय कहने लगा, ऐं कु-कुलीन कैसा?

पंच-हां अ-अ और क्या ।

मैं-तो क्या- व्याककरण के अनुसार कुकुत्सितः कुलीनः कुकुलीनः अर्थात् कुलीनों में सबसे उतार अथवा कुत्सितः प्रकारेण कुपृथिव्यांणलीनः-क्याय इस मनुष्यज जीवन में आपको क्या लोग अतिनिंदित समझते हैं?

पंच-अजी तुम तो बड़ी हिंदी की चिंदी निकालते हो। हम कुलीन हैं। एक कु को बतौर ब्यापज के समझो।

मैंने फिर कहा-अजी ब्या ज कैसा बड़े-बड़े सेठों के समान क्याह कुलीनता में भी कुछ ब्यामज देना होता है। मेरे मन में कुछ ऐसा आता है कि यह कुलीन कुलियों की जमात हैं तो यहां आपका क्यास काम है जाकर कुलियों में शामिल हो, बोझा ढोओ।

पंच-नहीं, नहीं तुम तो बड़े कठहुज्जोती मालूम होते हो। अरे कुलीन के अर्थ हैं अच्छे् वंश में उत्प न्नल। अब तो समझ में आया?

मैं फिर बोला-तो क्यात अच्छेठ वंश में पैदा होने ही से कुलीन हो गए कि कुलीनता की और भी कोई बात आप में है। मतलब सद्वृत्त अथवा विद्या इत्याादि भी है?

पंच-हम तो नहीं हमारे पूर्वजों में कोई एक शायद ऐसे हो गए हों। विद्या-बिद्या तो हम कुछ जानते नहीं। न सद्वृत्त जाने क्या है? हां पुरखों के समय से जो बित्ती भर दक्षिणा बंध गया आज तक बराबर पुजाते हैं और अंग्रेजी फैशन भी इख्तियार करते जाते हैं और फिर अब इस संसार में कौन ऐसा होगा जो मिलावटी पैदाइश का न हो। वैसा ही मुझे भी समझ लो-पैदाइश की आप क्याइ कहते हो। पैदाइश कमल की देखिए कैसे मैले और गंदले कीचड़ से उसकी उत्पइत्ति है। तो जब हम कुलीन हैं तो हमें अपने कुल का अभिमान क्यों न हो?

मैं-पंच महाराज यह तो वैसी ही है कि बाप ने घी खाया हाथ हमारा सूंघ लो। खाली पैदाइश से कुछ नहीं होता। आचारः कुलमा-ख्यााति कुछ आचार-विचार भी जानते हो?

पंच-डैम, आचार-विचार इसी की छिलावट में पड़े हुए लोग अपनी जिंदगी खो देते हैं। तरक्कील-तरक्कील चिल्लातया करते हैं और तरक्कीा खाक नहीं होती! इसी से तो इन सब बातों को हम फिजूल समझ आजाद बन गए हैं और इस समय के जेंटलमैनों में अपना नाम दर्ज करा लिया।

सच पूछो तो शराब और कबाब यही दोनों सामयिक सभ्य ता और कुलीनता का खास जुज है। हां इतनी होशियारी जरूर रहे कि प्रगट में बड़ा दंभ रचे रहे ऐसा कि कदाचित् कभी कोई देख भी ले तो रौब में आ किसी को मुंह खोलने की हिम्मीत न रहे।

मैं-हां यह ठीक कहते हो, पर कुछ गुण की पूंजी भी तो होनी चाहिए।

पंच-नॉनसेंस! दुनियां में कौन ऐसे होंगे जो अपने पुरखों की कुलीनता का दम न भरते हों और गुण तो वे सीखें जिनको कहीं दूसरा ठिकाना न हो। यदि गुण सीखकर पेट चला तो कुलीनता फिर कहां रही?

मैंने अपने मानवीय मित्र की अधिक पोल खोलना मुनासिब न समझा। इससे उनसे दो-चार इधर-उधर की बात कर रफूचक्कीर हुआ।

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