भारतीय पेमेंट नेटवर्क की मजबूत दावेदारी

विनय के पाठक

पेमेंट नेटवर्क की दुनिया में रुपे और यूपीआई जैसे भारतीय नेटवर्क के विस्तार से मास्टरकार्ड और वीजा जैसी विदेशी दिग्गज कंपनियां सकते में हैं। हालात यहां तक पहुंच गये कि मास्टरकार्ड को तो अमेरिकी प्रशासन से हस्तक्षेप की गुहार करनी पड़ी है। मास्टरकार्ड ने अमेरिका के ऑफिस ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (यूएसटीआर) के पास शिकायत देकर कहा है कि भारत की नरेंद्र मोदी सरकार अपने पेमेंट नेटवर्क को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा ले रही है। इस शिकायत में कहा है कि भारत सरकार संरक्षणवादी नीति अपनाने जा रही है। इससे विदेशी पेमेंट कंपनियों का नुकसान हो रहा है। मास्टरकार्ड ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रुपे कार्ड के इस्तेमाल को यह कहते हुए राष्ट्रवाद से जोड़ दिया है कि यह एक प्रकार से राष्ट्र की सेवा है। मास्टरकार्ड की तरह ही न्यूयॉर्क की पेमेंट कंपनी पर्चेज ने भी रुपे के विस्तार पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी पेमेंट प्रोसेसर कंपनी पर्चेज ने रुपे के विस्तार की वजह से अमेरिकी कंपनियों को हो रहे नुकसान की चर्चा की है। उसने इस मामले में अमेरिकी प्रशासन से दखल आग्रह किया है। साफ है कि रुपे और यूपीआई की सफलता ने विदेशी दिग्गजों के होश उड़ा दिए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2005 में ऐसी स्वदेशी सेवा की कल्पना की थी, जिससे भारत में भुगतान व्यवस्था के लिए विदेशी पेमेंट नेटवर्क का सहारा न लेना पड़े। इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि विदेशी भुगतान कंपनियां भारतीय ग्राहकों का डाटा अपने अमेरिकी सर्वर में रखती हैं और उन्हें कभी भी अमेरिका के हितों के मद्देनजर लीक किया जा सकता है। यही वजह है कि अभी हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने इन विदेशी पेमेंट नेटवर्क कंपनियों को भारतीय उपभोक्ताओं का डाटा भारत के सर्वर में ही स्टोर करने का निर्देश दिया है। रिजर्व बैंक की कल्पना के तहत भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) को इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई। एनपीसीआई ने अप्रैल 2013 में रुपे सेवा को शुरू कर दिया और 8 मई 2014 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत का अपना भुगतान कार्ड रुपे राष्ट्र को समर्पित किया। इस परियोजनाओं में भारत के तमाम बड़े बैंक जुड़ चुके हैं और यह लगतार अपने नेटवर्क का विस्तार करने में लगा हुआ है। इसका उपयोग एटीएम मशीनों से पैसा निकालने, दुकानों तथा पेट्रोल पंप आदि पर कार्ड से भुगतान करने के साथ ही ऑनलाइन खरीद-बिक्री आदि में भी किया जाता है। रुपे के प्रचलन में आने के साथ ही भारत उन कुछ गिने-चुने देशों की श्रेणी में आ गया है, जिन्होंने अपना खुद का भुगतान मार्ग तैयार कर लिया है। सरकार का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में रुपे का विस्तार होने से आने वाले दिनों में नगदी पर निर्भरता कम की जा सकेगी और उपभोक्ताओं को देश में भुगतान के विकल्पों की विविधता भी मिल सकेगी। असल में रुपे के रूप में भारत को ऐसा सशक्त पेमेंट नेटवर्क हासिल हो गया है कि विदेशी दिग्गज मास्टरकार्ड और वीजा को भारत में अपना कारोबार सिमटने का डर सताने लगा है। इसमें कोई शक नहीं है कि भारत सरकार स्वदेशी पेमेंट नेटवर्क रुपे को बढ़ावा दे रही है और कुछ ही साल में इसने अपनी सफलता की कहानी लिख दी है। हालत यह है कि देश में लगभग एक अरब डेबिट और क्रेडिट कार्ड में आधे से अधिक में रुपे पेमेंट सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ साल पहले तक कार्ड पेमेंट सिस्टम में पूरी दुनिया की तरह भारत में भी वीजा और मास्टरकार्ड का ही दबदबा था। वित्तमंत्री अरुण जेटली के दावों को मानें तो रुपे के विस्तार और स्वदेशी तौर पर विकसित यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) की वजह से वीजा और मास्टरकार्ड की भारतीय बाजार में हिस्सेदारी तेजी से घट रही है। कुछ ऐसा ही हाल न्यूयॉर्क की पेमेंट कंपनी पर्चेज का भी है। पर्चेज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी पेमेंट प्रोसेसर कंपनी है और रुपे तथा यूपीआई के विस्तार से इसे भी काफी झटका लगा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली का दावा है की डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड से किए जाने वाले भुगतान में स्वदेशी तौर पर विकसित यूपीआई और रुपे कार्ड की बाजार हिस्सेदारी 68 फीसदी तक पहुंच गई है। अनुमान लगाया जा सकता है यूपीआई और रुपे की वजह से विदेशी पेमेंट नेटवर्क को संचालित करने वाली मास्टरकार्ड, वीजा या पर्चेज जैसी कंपनियों को कितना कड़ा झटका लगा है। कोई भी ग्राहक जब भुगतान के लिए क्रेडिट या डेबिट कार्ड का उपयोग करता है, तो उसे पेमेंट नेटवर्क का सहारा लेना पड़ता है। पेमेंट नेटवर्क कंपनियां विभिन्न बैंकों से समझौता करती हैं। भुगतान के एवज में ये कंपनियां 0.8 फीसदी से 2.12 फीसदी तक का ट्रांजेक्शन चार्ज वसूलती हैं। कई कंपनियां इस ट्रांजैक्शन चार्ज को खुद वहन करती हैं, जबकि कई कंपनियां इसके लिए ग्राहकों से ट्रांजेक्शन चार्ज लेती हैं। यही ट्रांजेक्शन चार्ज पेमेंट नेटवर्क कंपनियों की शुद्ध कमाई होती है। अभी तक वीजा और मास्टरकार्ड जैसी विदेशी पेमेंट नेटवर्क कंपनियां हर साल अरबों रुपये ट्रांजेक्शन चार्ज के रूप में भारत से वसूलती थीं। अब रुपे कार्ड पर यूपीआई के प्रचलन में आने की वजह से ट्रांजेक्शन चार्ज का एक बड़ा हिस्सा भारतीय पेमेंट नेटवर्क के पास ही आता है। चूंकि यह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है और इसका गठन भारतीय रिजर्व बैंक में स्वदेशी सेवा की आवश्यकता की कल्पना को लेकर किया गया है, इसलिए कंपनी को ट्रांजेक्शन चार्ज के रूप में मिलने वाली पूरी राशि परोक्ष रूप से भारत सरकार की कमाई होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रुपे और यूपीआई जैसे स्वदेशी पेमेंट नेटवर्क का यह कहते हुए बार-बार समर्थन किया है कि इनका इस्तेमाल परोक्ष रूप से देश की सेवा करना है। ऐसा इसलिए कि इसका ट्रांजेक्शन चार्ज विदेश जाने की जगह देश के पास ही रहता है। इस राशि का उपयोग देश में ढांचागत सुविधाओं को तैयार करने में किया जा रहा है। दरअसल यही भारतीय पेमेंट नेटवर्क की सबसे बड़ी सफलता है। भारतीय पेमेंट नेटवर्क के रूप में पिछले तीन-चार वर्षों में रुपे कार्ड और यूपीआई ने जबरदस्त सफलता अर्जित की है। यूपीआई की शुरुआत 2016 में की गई थी। इसमें दो मोबाइल उपयोगकर्ताओं के बीच रियल टाइम में भुगतान किया जाता है। इसका कामकाज किस तेजी के साथ बढ़ा है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अक्टूबर 2016 में यूपीआई के जरिए 50 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था, जो दो वर्षों में ही बढ़कर 59,800 करोड़ रुपये हो गया। इसके अलावा भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने भीम एप को भी लॉन्च किया है। यह भी यूपीआई पर ही काम करता है। अभी करीब सवा करोड़ लोग इसका उपयोग करते हैं। सितंबर 2016 में भीम ऐप से होने वाले लेनदेन की राशि लगभग दो करोड़ रुपये थी, जो दो साल बाद सितंबर 2018 में बढ़कर 7,060 करोड़ रुपये हो गई। नोटबंदी से पहले रुपे कार्ड से देश में 800 करोड़ रुपये का लेन-देन होता था, जो सितंबर 2018 तक बढ़कर 5,730 करोड़ रुपये हो गया। यह लेनदेन कार्ड के स्वाइप यानी पॉइंट ऑफ सेल के माध्यम से हुआ। जबकि रुपे कार्ड से ई-कॉमर्स साइट्स पर की जाने वाली खरीद 300 करोड़ से बढ़कर 2,700 करोड़ रुपये हो गई। साफ है कि रुपे और यूपीआई के जरिए भारतीय पेमेंट नेटवर्क का काफी तेजी से विस्तार हो रहा है। भारत सरकार की योजना भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम का कामकाज दक्षिण एशिया के मित्र देशों में भी प्रसारित करने का है। इसके साथ ही रुपे को जल्द ही अफ्रीकी देशों में भी लॉन्च किया जा सकता है। यदि ऐसा हो गया, तो भारतीय पेमेंट नेटवर्क न केवल भारत में ट्रांजैक्शन फी के तौर पर लगने वाली पैसे को बचा सकेगा, बल्कि ट्रांजेक्शन चार्ज के जरिये विदेशी मुद्रा की भी आय कर सकेगा। रुपे के विस्तार की यही योजना मास्टरकार्ड और वीजा जैसी विदेशी दिग्गज कंपनियों को परेशानी में डालने वाली हैं। सरकार का मानना है कि अगर रुपे को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा दिया गया, तो इसका धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर प्रसार हो सकता है। इससे न केवल विदेशी दिग्गज कंपनियों की भारतीय बाजार में हिस्सेदारी घटेगी, बल्कि भारतीय पेमेंट नेटवर्क खुद भी अच्छी कमाई कर देश के विकास में अपना योगदान कर सकेगा।

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