पुलिस का घटता रसूख चिंताजनक

सियाराम पांडेय ‘शांत’

हिंसा छोटी हो या बड़ी,समाज को प्रभावित करती है। इससे समाज का विकास अवरुद्ध होता है। हिंसा जिला और पुलिस प्रशासन की लापरवाही भी बयां करती है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी की कहावत निर्मूल नहीं है। पुरखों ने हृदय के तराजू पर तौल कर ही कोई बात कही है। उसे न तो खारिज किया जा सकता और न ही हवा में उड़ाया नहीं जा सकता है। बुलंद शहर में हुई घटना इस बात का प्रमाण है कि पुलिस ने ग्रामीणों की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। अगर वह पहले ही सतर्क हो जाती तो एक इंस्पेक्टर सहित दो लोगों की मौत न हुई होती। सरकार को मुआवजे पर 60 लाख रुपये खर्च न करने पड़ते। मुआवजा देना बुरा नहीं है। पीड़ितों के आंसू सरकार नहीं तो कौन पोछेगा? लेकिन मुआवजा देते रहना ही समस्या का समाधान नहीं है। मुआवजा राशि जनता के खून पसीने की कमाई है और इस राशि का इस्तेमाल अत्यंत सावधानी और पारदर्शिता से किया जाना जरूरी है। इस तरह के घटनाक्रम हों ही नहीं,पहले तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। गाय इस देश में अत्यंत आदृत जानवर है। हिन्दू जनमानस उसे माता मानता है। गाय के शरीर मे समस्त देवताओं का निवास होता है। उसके खुरों में धर्म और मोक्ष का निवास होता है। उसके दूध को अमृत कहा जाता है। गाय भारतीय अर्थ व्यवस्था में वृद्धि ही करती है। वह जब बूढ़ी हो जाती है,तब भी उसके गोबर से किसानों के खेत की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। कुरान शरीफ में भी गाय के दूध को अमृत और उसके मांस को बीमारियों का घर कहा गया है। ऐसी लोकोपकारी गाय का वध गले के नीचे नहीं उतरता। गाय की हत्या करने वालों,बूचड़खाना चलाने वालों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पदभार संभालते ही उत्तरप्रदेश में बूचड़खानों पर रोक लग गई थी लेकिन इसका विरोध करने वालों की भी कमी नहीं रही। कई राजनीतिक दलों ने इसे अल्पसंख्यकों जो अब बहुसंख्यक होने के करीब हैं,के भोजन पर आघात करार दिया। वहीं मांस के दुकानदारों ने कहा था कि सरकार के इस निर्णय से उनका कारोबार चौपट हो गया है। रोक तो केवल गाय का मांस परोसने पर लगी थी फिर उनका कारोबार ठप कैसे हुआ? यह भी पता चला कि उनके ग्राहकों में अधिकतर हिन्दू थे। गाय के दुश्मनों में कुछ हिन्दू भी हैं। जिस गाय ने, उनके वंशजों ने जीवन भर किसी परिवार की सेवा की,उसके निष्प्रयोज्य होते ही उसे कसाई के हाथ बेच देना कहां तक न्यायसंगत है? गाय को ट्रकों में किस तरीके से बांध कर ले जाया जाता है,उससे गाय को कितनी पीड़ा होती है,यह बात किसी से छिपी नहीं है।अपने स्वार्थ के लिए कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है? कभी कभी तो गाय बीच रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं। उनकी पीड़ा का विचार किए बिना पुलिस के कुछ कर्मचारी पशु तस्करों से पैसा लेकर उन्हें आगे जाने देते हैं। वध-स्थल तक जानवरों की आमद सुनिश्चित कराने में पुलिस की भी बड़ी भूमिका होती है ।इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता। गो वध पर प्रतिबंध के बावजूद जीटी रोड पर रात में गोवंश लदे ट्रक आज भी हजारों की तादाद में जाते हैं। जीटी रोड पर स्थित एक भी थाना ऐसा नहीं होगा जहां पशुतस्करों से सुविधा शुल्क न लिए जाते हों। जिन थानों को सुविधाशुल्क नहीं मिलता,वहां दो-एक ट्रक पकड़कर विभागीय वाहवाही लूट लेते हैं। बुलंद शहर से सर्वाधिक गाय,बैल,बछड़े कटने के लिए पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं। यह खेल लंबे अरसे से चल रहा है। सवाल यह उठता है कि जब पुलिस को गोवंश के काटे जाने की सूचना दी गई थी तो वह वहां क्यों नहीं गई।जब भीड़ सड़क पर आ गई, कभी वह मौके पर क्यों पहुंची? क्या इसके पीछे कोई और कारण है ? पुलिस को पता था कि पड़ोस में इज्तिमा चल रही है जहां लाखों लोग मौजूद हैं। फिर पुलिस को ऐसा क्यों नहीं लगा कि यह मामला तूल भी पकड़ सकता है। इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की मौत पर 40 लाख और उनके बच्चों को दस लाख का मुआवजा तो ठीक है,लेकिन इसी हिंसा में मारे गए सुमित कुमार के परिजन को केवल दस लाख का मुआवजा क्यों? क्या जान की कीमत भी पहचान कर लगती है? योगी सरकार को इसका जवाब तो देना ही चाहिए। यह सच है कि पुलिस व्यवस्था का अंग है। उसके बिना विधि व्यवस्था नहीं सध पाती लेकिन इसका मतलब यह हरगिज नही कि पुलिस को परम स्वंतंत्र बना दिया जाए । वह परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ की अवधारणा में जीने लगे,इसे बहुत मुफीद नहीं कहा जा सकता। बुलंद शहर की हिंसा अत्यंत त्रासद है,उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है,लेकिन विपक्ष जिस तरह से सरकार पर हमलावर हो रहा है,वह उचित नहीं है। गाय का वध रोकना इस देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी है। केवल आरोप- प्रत्यारोप से बात नहीं बनेगी। हमें सोचना होगा कि जो गाय सबको सुख देती है,उसे दुख देने का किसी भी व्यक्ति को नैतिक अधिकार नहीं है। गावः सर्व सुखप्रदाः। रही बात जनता के पुलिस पर हमलावर होने की तो इस पर पुलिस विभाग को भी विचार करना होगा कि उस पर बार-बार जनता आक्रामक क्यों हो रही है? उसे इसके कारणों की जद में जाना होगा। पुलिस को अपना इकबाल बुलंद करना होगा। अपनी गलतियों को सुधारना होगा। इस मामले के दोषियों पर कार्रवाई होनी ही चाहिए लेकिन गाय की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। गाय ही सुरक्षित नहीं रही तो पर्यावरण कैसे सुरक्षित रहेगा,विचार तो इस पर भी होना चाहिए। पुलिस पर बढ़ते हमले और उसका घटता रसूख चिंताजनक तो है ही,इसका अतिशीघ्र समाधान तलाशे जाने की जरूरत है।

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