पितरों के तर्पण का शुभ दिन

-पं. भानुप्रतापनारायण मिश्र-

मार्गशीर्ष अमावस्या इस बार शनिवार को है। इस अमावस्या का अद्भुत फल है। उच्च का बृहस्पति वृश्चिक राशि में बैठे सूर्य, शनि, शुक्र और चंद्रमा को पांचवीं दृष्टि और केतु को नवम दृष्टि से देख कर गुरु कृपा बरसा रहा है। ग्रहों की इस बलवान स्थिति में अमावस्या का होना इस बात का संकेत है कि हम अपने पितरों को हर हा में इस दिन स्मरण करें और जो कुछ भी हमारे पास उपलब्ध है, पूरे परिवार के साथ उन्हें अर्पित करें। यूं तो हर अमावस्या का अपना महत्व है, लेकिन शनैश्चरी अमावस्या के दिन अपने पितरों को अर्पित किया गया भोग और तर्पण हमारे बहुत से संकटों को समाप्त कर जीवन पथ पर विकास का मार्ग उपलब्ध कराता है। जिन लोगों की जन्मराशि मेष और सिंह है, उन पर शनि की ढैया और जिनकी तुला, वृश्चिक और धनु राशि है, उन्हें शनि की साढ़ेसाती से जूझना पड़ रहा होगा। इन लोगों को इस दिन पिप्पलाद मुनि की कथा, जिसका वर्णन भविष्यपुराण में मिलता है और पद्मपुराण में वर्णित राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। अगर आपका मेष, वृष, कन्या, तुला, मकर और कुंभ लग्न है और शनि की साढ़ेसाती और ढैया वाली राशियों में आपकी राशि भी शामिल है तो हर हा में इस दिन आपको पूजा करनी चाहिए। संभव हो तो तीन से पांच रत्ती का नीलम दान करें या शुक्ल पक्ष के किसी शनिवार को जन्मलग्न अनुकूल होने पर ही नीलम धारण करें। पूजा करने से जहां इन राशियों को करियर की समस्याओं और चले आ रहे रोगों आदि से मुक्ति मिलेगी, वहीं कर्ज आदि उतरने के साथ-साथ विवाह की संभावना भी बनने गेगी। जिन लोगों की जन्मकुंडली में पितृ दोष से संतान आदि ना होने की आशंका है, उन्हें इस दिन अवश्य शनि की पूजा करने के बाद सरसों के तेल, काले तिल, काली उड़द की दाल आदि का दान अवश्य करना चाहिए। सर्दी में कंबल या ऊनी वस्त्र का दान भी बहुत शुभ माना जाता है। शनि देव उस आदमी से बहुत नाराज होते हैं, जो अपने नौकरों का अपमान करते हैं और किसी तरह का कष्ट आदि देते हैं। शनि से पीड़ित राशियों को इस दिन इस बात का प्रण लेना चाहिए कि वे किसी भी तरह से किसी को सताएंगे नहीं। शनि एक न्यायप्रिय ग्रह हैं, जो किसी तरह के अन्याय करने पर कठोर सजा देते हैं। जिन लोगों की जन्मकुंडली में शनि अपनी नीच राशि मेष में हैं, उन्हें तो सदैव शनैश्चरी अमावस्या पर पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ अपने पितरों को भोग और तर्पण द्वारा प्रसन्न करना चाहिए। यूं तो हमेशा ही परिवार के बुजुर्ग सदस्यों की सेवा करनी चाहिए, लेकिन इस दिन तो हर हा में ऐसा कोई कर्म नहीं करना चाहिए, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक कष्ट हो, बल्कि बुजुर्गों की प्रसन्नता के लिए उनकी इच्छाएं पूरी करनी चाहिए।

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