नमाज पर विवाद सिर्फ सियासी प्रलाप

सियाराम पांडेय ‘शांत’

विवाद कहीं भी, कभी भी हो सकता है। किसी भी वजह से हो सकता है। विवाद सनातन सत्य है। जहां आदमी विवाद पर ही आमादा हो, वह पंचों के आदेश को सिर माथे रखने की बात तो करता है लेकिन अपना खूंटा भी जगह से हिलने नहीं देना चाहता। विपक्ष के साथ भी कुछ ऐसा ही है। उसे केवल भाजपा का विरोध करना है और इसके लिए वह मौका तलाशता है। पूर्वाग्रह मन में कूट-कूट कर भरा हो तो अच्छा भी खराब दिखता है। नमाज पर विवाद अब आम हो गया है। विपक्ष मुसलमानों का हित भले न कर पाए,उनकी समस्याओं का निराकरण भले ही न कर पाए लेकिन उन्हें मजहबी द्वंद्व में उलझाए रखने की जुगत में उसका कोई जोड़ नहीं है। धर्म के नाम पर आग लगाना और देश के अमन-चैन को पलीता लगाने की इन दिनों हर संभव कोशिश हो रही है। नोएडा सेक्टर 58 की पुलिस ने 23 कंपनियों को नोटिस जारी कर कहा है कि वह अपने कर्मचारियों को बिना अनुमति पार्क में नमाज अदा न करने दें। इबादत की जानी चाहिए लेकिन उसका दिखावा नहीं होना चाहिए। मंदिर-मस्जिद में ही पूजा और नमाज होनी चाहिए या फिर अपने घर में यह सब होना चाहिए। धार्मिक कर्मकांड का दिखावा किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है। मुस्लिम समाज के साथ परेशानी है कि वह सुबह ही अजान के लिए लाउडस्पीकर लगा देते हैं। जो नमाज पढ़ने वाले हैं, वे इससे जाग जाते हैं। उन्हें सूचना हो जाती है लेकिन उनका क्या जो अनिद्रा दोष के शिकार हैं। बीमार हैं। उनकी जल्दी नींद टूट जाती है। छात्र भी देर रात तक अध्ययन करते हैं। सुबह के वक्त सोते हैं, इससे उन्हें परेशानी होती है। प्रख्यात गायक सोनू निगम ने इस मामले को उठाया भी था। तब भी उनकी जमकर आलोचना हुई थी। मुसलमानों ने तो उनकी आलोचना की ही थी। तथाकथित धर्म निरपेक्ष हिंदुओं ने भी उनकी लानत मलामत करने में कोई कोर-कसर शेष नहीं रखी थी। एक बार पुनश्च सोनू निगम ने खुले आम सड़कों और पार्कों में जुमे की नमाज अदा किए जाने पर एतराज किया है। तमाम राजनीतिक दलों ने इसे सरकारी फतवा बताया है। इस बहाने केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार को मुस्लिम विरोधी बताना आरंभ कर दिया है। ऐसे लोगों को लगे हाथ कबीरदास की चिंता से भी संपृक्त होना चाहिए। कबीरदास ने कहा था कि ‘ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदा।’ यह अपने आप में बेहद तल्ख टिप्पणी थी। मतलब उस समय भी लोग उंची आवाज में अजान पढ़ने से दुखी हुआ करते थे। सड़क और पार्क सार्वजनिक होते हैं। उनका धायान रखा जाना चाहिए। बसपा प्रमुख मायावती को लगता है कि पांच राज्यों के विधान सभा में मिली हार के बाद भाजपा घबरा गई है और इस तरह के अविवेकपूर्ण निर्णय ले रही है। उनके मुताबिक योगी सरकार की सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों पर पाबन्दी लगाने की अगर कोई नीति है तो वह सभी धर्मों के लोगों पर एक समान तौर पर और पूरे प्रदेश के हर जिले, हर जगह सख्ती से बिना किसी भेदभाव के क्यों नहीं लागू की जा रही है? मानना है कि जब वहां फरवरी 2013 से नमाज हो रही थी तो पहले क्यों नहीं रोका गया? इस सवाल का जवाब तो उन्हें अखिलेश यादव से पूछना चाहिए। मायावती, अखिलेश समेत तमाम विपक्षी नेताओं को हर सरकारी कार्रवाई में लोकसभा चुनाव के नफे-नुकसान ही क्यों नजर आते हैं? जवाब तो इसका मिलना चाहिए। अगर कानून का उल्लंघन पूर्व शासन में हुआ तो जरूरी नहीं कि भाजपा सरकार भी वही रीति-नीति अपनाए? गौरतलब है कि 19 दिसंबर को सेक्टर-58 के पार्क में नमाज पढ़ने पर नौमान अख्तर समेत दो लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। अगले दिन दोनों जमानत पर छूटे। पुलिस की इस राय में दम है कि वे जबरन पार्क में नमाज पढ़ाना चाहते थे, जो कि कानून का उल्लंघन है। बुलंद शहर में हुई हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध राय की हत्या हो गई। पता चला कि बगल में ही देश भर के मुसलमान नमाज अदा कर रहे थे। गोवंश किसने काटा, यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन प्रशासन की अनुमति के बिना क्या इतने लोग एक जगह इकट्ठा हो सकते हैं? पुलिस या आमजन अगर इस बावत सोचता है, शंका व्यक्त करता है तो यह उसका हक भी है और सुरक्षा चिंता का सबब भी है। हरियाणा के गुरुग्राम में भी खुले में नमाज पर इसी तरह का आदेश जारी किया गया था। कुछ हिंदू संगठनों ने भी खुले में नमाज पढ़े जाने का विरोध किया था। भाजपा का तर्क है कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। उसने जो कुछ भी किया है, वह जन सुरक्षा के आलोक में हैं, उसके निर्णय पर राजनीति करने का कोई औचित्य नहीं हैं? इसमें हर राजनीतिक दल को सहयोग देना चाहिए लेकिन यहां बिल्कुल उल्टा हो रहा है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर हमला ही बोल दिया है कि वह कांवरियों पर तो गुलाब की पंखुड़ियां बरसा रही थी किंतु सार्वजनिक स्थलों पर प्रार्थना करने वाले मुस्लिम आस्तिकों को नोटिस जारी कर रही है। आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद उल मुस्लमीन (एआईएमआईएम) नेता ने मुसलमानों से कहा है कि आप कुछ भी कर लो, गलती आप की ही होगी। उनके इस बयान पर भाजपा ने तो ओबैसी को अपना मानसिक परीक्षण तक कराने की सलाह दे दी है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी लगता है कि पुलिस प्रशासन भाजपा कार्यकर्ताओं जैसा बर्ताव कर रह रहा है जबकि इस्लामिक शिक्षण संस्था देवबंद के दारूल उलूम के मुफ्ती अहमद गौड ने कहा है कि सरकारी जमीन पर नमाज पढ़ना गलत है। पार्क आदि में नमाज पढ़ने से यदि कोई विवाद पैदा होता है तो नमाज नहीं पढ़ी जानी चाहिए। नमाजियों को वहां के सरकारी अमले या जमीन के मालिक से इजाजत लेकर ही नमाज अदा करनी चाहिए। मुफ्ती ने कहा कि नमाज पढ़ने से यदि विवाद पैदा होता है या किसी को आपत्ति होती है तो ऐसी जगह नमाज नहीं पढ़नी चाहिये क्योंकि शरीयत ऐसी जगह पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं देती। जदयू नेता केसी त्यागी को भी लगता है कि प्रशासन का इस तरह का कदम स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपनी तरह का पहला निंदनीय कदम है। हाल ही में एक मुस्लिम संस्था ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका डालकर अयोध्या के राम जन्म भूमि परिसर में हाईकोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद के लिए दी गई जमीन के टुकड़े पर नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे न केवल शरारत माना बल्कि याचिकाकर्ता पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। पूजा-इबादत का सभी को हक है लेकिन इस बात का तो ध्यान रखा ही जाना चाहिए कि उससे किसी को कोई परेशानी न हो।

This post has already been read 302500 times!

Sharing this

Related posts

Leave a Comment