डाइबिटिज फुट को न करें नजरअंदाज

डाइबिटीज यानी मधुमेह से आपके पैर सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इससे न केवल पैरों की खूबसूरती खत्म हो सकती है बल्कि आप अनेक बीमारियों से भी ग्रस्त हो सकते हैं।

रोग का स्वरूप:- डाइबिटीज की शुरुआत में खून का प्रभाव पैरों तक ठीक तरह से नहीं पहुंच पाता। इस कारण पैरों में ऑक्सीजन और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप पैरों में कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। वास्तव में इन बीमारियों को ही डाइबिटिक फुट कहा जाता है। देश में मधुमेह रोगियों की बढ़ती तादाद के साथ ही विकलांग बना देने वाली बीमारी नॉन हीलिंग अल्सर (जल्द न भरने वाले घाव) के खतरे भी बढ़ रहे हैं। पैरों को निष्क्रिय बना देने वाली इस खतरनाक बीमारी की शुरुआत हाथ-पैरों में संवेदनहीनता से होती है, जिसे नजरअंदाज करना मरीज को इस कदर प्रभावित करता है कि संक्रमित हिस्से को ऑपरेशन कर काटने की भी नौबत आ सकती है। आइए जानते हैं। डाइबिटिक फुट से जुडी समस्याओं और उनके इलाज के बारे में…

डाइबिटिक एथेरोस्क्लीरोसिस- मधुमेह से पीड़ित मरीजों की रक्त धमनियां संकरी हो जाती हैं। इस कारण रक्त प्रवाह अपेक्षाकृत मंद गति से होता है। इस स्थिति को डाइबिटिक एथेरोस्क्लीरोसिस कहते हैं। इस रोग के होने के बाद रोगी को हड्डियों व जोड़ों के रोग, ऑस्टियोपोरोसिस, जोड़ों के संतुलन के अस्थिर होने के कारण पैरों में टेढ़ापन और सुन्नपन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

डाइबिटिक न्यूरोपैथी- शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ जाने के कारण नसें(नव्र्स) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं जिससे हाथ व पैरों में झनझनाहट और सुन्न पडऩे या जलन का अनुभव होता है। इस स्थिति को डाइबिटिक पेरीफेरल न्यूरोपैथी कहा जाता है। नसें क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण मस्तिष्क से संवेदनाओं का आदान-प्रदान बाधित हो जाता है । ऐसे में पैर या हाथ में छोटी- छोटी चोट और उनके बचाव की संवेदना न पहुंचने के कारण घाव बन जाता है। ऐसे घाव सामान्य घाव से कहीं अधिक गंभीर होते हैं। इसलिए इन्हें नॉन हीलिंग अल्सर भी कहा जाता है। लंबे समय से घाव बने रहने के कारण इनमें जीवाणुओं का संक्रमण होना सामान्य बात है। यदि इसकी चिकित्सा सही समय पर न हो, तो प्रभावित अंग को काटने की नौबत भी आ सकती है।

पेरिफेरल ज्वाइंट डिजीज-डाइबिटीज के मरीजों में नसों की खराबी के कारण मांसपेशियों द्वारा असंतुलित बल लगने से जोड़ अपने सामान्य आकार से हटकर टेढ़े होने लगते हैं। जोड़ों के टेढ़े होने के बाद भी शरीर बचाव की क्रिया नहीं कर पाता। ऐसा इसलिए, क्योंकि संबंधित नसें, हड्डियां, और मांसपेशियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। सही समय पर उपचार न होने के कारण विकृति से बचने के सभी उपाय समाप्त होने लगते हैं।

डाइबिटिक फुट के लक्षण:-

-पैरों के तलवों में जलन।

-पैरों की उंगलियों में झनझनाहट।

-पैरों में सुन्नपन।

-ठंड सहन न कर पाना।

-त्वचा के रंग में परिवर्तन।

-पैरों और उंगलियों का टेढ़ापन।

-लंबे समय से न भरता घाव और चोट लगने पर बना छोटा घाव, जो बढ़ रहा हो।

-पैरों में संवेदनहीनता।

सावधानियां:- मधुमेह के मरीज कुछ सावधानियां बरतकर पैरों की विकलांगता के खतरे से बच सकते है। इए मरीजों को अपनी-अपनी शुगर को नियंत्रित करना चाहिए। ऐसे रोगियों को हमेशा एक विशेष प्रकार के मुलायम गद्देदार (सिलिकॉन पैड वाले) जूते पहनने चाहिए। साथ ही, सिलिकॉन रबर का पैतावा डालकर जूते पहनने चाहिए जिससे जोड़ों या शरीर के अन्य भागों पर अधिक दबाव न पड़े। अत्यंत ठंडे और गर्म माहौल से बचना चाहिए।

जांचें:- सामान्यतः डाइबिटिक फुट में मरीज को देखकर रोग का पता लग जाता है, पर कुछ विशेष स्थितियों में विशेष जांचें जैसे एनसीवी कंप्लीट शुगर प्रोफाइल, एक्सरे और वैस्कुलर डॉप्लर जांचें करायी जाती हैं।

चिकित्सा:- इन सभी जांचों और मरीज की रोग की स्थिति के अनुसार अनेक उपचार संभव हैं। यदि किसी कारणवश पैरों में अल्सर बन गया है, तो ऐसे मरीजों को इंसुलिन इंजेक्शन के प्रयोग के साथ ही विशेषज्ञ से देरी किए बगैर सलाह लेना चाहिए।

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