जासूसी से सुरक्षित एक खास स्मार्टफोन

अमेरिका की खुफिया एजेंसी एनआईए (नैशनल सिक्युरिटी एजेंसी) की तरफ से दुनिया भर के लोगों के इंटरनेट संदेशों और मोबाइल संदेशों की निगरानी रखे जाने की खबरें अभी पुरानी नहीं पड़ी हैं। अमेरिका में एक ऐसी भी परियोजना है जिसके तहत हर व्यक्ति के टेलीफोन कॉल्स को मॉनीटर किए जाने की योजना है। अमेरिका ही क्यों, भारत में भी सेंट्रल मॉनीटरिंग सिस्टम (सीएमएस) और नेत्र जैसी साइबर निगरानी प्रणालियाँ मौजूद हैं, जिनका निशाना आम और खास लोगों की साइबर गतिविधियाँ और संदेश हो सकते हैं। सवाल उठता है कि वह आम कंप्यूटर तथा इंटरनेट उपयोक्ता, जिसका किसी तरह के अपराधों से कोई लेना-देना नहीं है और जो अपनी प्राइवेसी (निजता) की सुरक्षा को लेकर सजग है, वह ऐसी सरकारी जासूसी और निगरानी से अपने आपको कैसे सुरक्षित रखे? इस विश्वव्यापी चिंता का नतीजा है एक नई किस्म का स्मार्टफोन, जिसकी गतिविधियाँ बाहरी निगरानी से लगभग मुक्त हैं। नाम है- ब्लैकफोन। साइलेंट सर्कल और गीक्सफोन नाम की दो कंपनियों ने मिलकर इसका विकास किया है। साइलेंट सर्कल वही कंपनी है जो अभी हाल तक एक सुरक्षित ईमेल सेवा का संचालन करती थी, जिसके भीतर घुसपैठ करना हैकरों और जासूसों दोनों के लिए ही बेहद मुश्किल था। यह ईमेल सेवा अब बंद हो चुकी है। अलबत्ता, इस कंपनी ने एक नए हार्डवेयर और नए ऑपरेटिंग सिस्टम की मदद से ऐसा सुरक्षित स्मार्टफोन बना लिया है, जिसका डेटा एक तरह के अभेद्य लौह-आवरण की हिफाजत में रखा हुआ है। पहले अगर आप अपनी प्राइवेसी को बचाना चाहते थे तो तरह-तरह के सॉफ्टवेयरों, इंटरनेट सर्विसेज आदि की मदद लेनी होती थी। यह एक जटिल काम था और आम यूज़र प्रायः उलझकर रह जाता था। ब्लैकफोन की खासियत यह है कि यहाँ आपको कोई कन्फीगरेशन या किसी बाहरी एनक्रिप्शन सेवा के साथ माथापच्ची करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एनक्रिप्शन, सिक्योर डेटा ट्रांसफर, सेफ स्टोरेज और एक्सेस पर प्रतिबंध जैसी तमाम सुविधाएँ इसके भीतर ही समाहित हैं। यूज़र को बस फोन का इस्तेमाल भर करना है। अगर आप एंड्रोइड ऑपरेटिंग सिस्टम को पसंद करते हैं तो निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि ब्लैकफोन का सुरक्षित ऑपरेटिंग सिस्टम प्राइवेटओएस मूल रूप से एंड्रोइड पर ही आधारित है। उसकी तमाम खूबियाँ और रफ़्तार यहाँ भी मौजूद है, बस सिक्युरिटी फीचर्स बढ़ गए हैं। सबसे खास बात है इसमें मौजूद एनक्रिप्शन प्रोसेस जो आपकी हर बातचीत, हर संदेश और हर डेटा को कूट भाषा में बदलकर इस्तेमाल करती है। अगर कोई इस तरह के संदेशों में घुसपैठ करने में भी कामयाब हो जाए तब भी वह इन्हें समझ नहीं पाएगा। हालाँकि यह सवाल फिर भी जायज है कि चूँकि फोन तो फोन है और वह टेलीकॉम आपरेटर की सेवाओं पर निर्भर है इसलिए सीधे टेलीकॉम ऑपरेटर (वोडाफोन, एअरटेल, बीएसएनएल आदि) के स्तर पर होने वाली निगरानी को वह नहीं रोक सकेगा। फिर भी, ब्लैकफोन प्राइवेसी सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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