(कहानी) बौना अहसास

-स्व. घनश्याम रंजन-

किसन उससे चाय की दुकान में टकरा गया था, अकस्मात्। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि गोपी से उसकी यहां भेंट हो जाएगी। गोपी के विषय में उसने सोचा अवश्य था। सोचने की बात भी थी। वह यूं कि गोपी उसका दोस्त था। दोस्त भी ऐसा-वैसा नहीं। साथ पढ़ा, साथ रहा। खूब पटती थी दोनों में।

कितने ही वर्ष पूर्व उसने अपना मकान बदल दिया था। गोपी भी पेट की वजह से दूसरे शहर में पहुंच गया था, किंतु उसका पता- ठिकाना उसे ज्ञात नहीं था। ज्ञात होता तो इतने दिनों में कई दफा वह भेंट मुलाकात कर चुका होता। गोपी को भी उसके मकान का पता ज्ञात नहीं था।

उस दिन चाय की दुकान में वह गोपी से न टकरा गया होता तो संभवतः गोपी की याद उसे न आती।

ओ हो, गोपी तुम यहां?

और किशन, तुम यहां कैसे?

तुम बताओ, तुम यहां कैसे?

मगर तुम यहां कैसे?

दोनों की स्थिति बड़ी अजीब थी। अचानक हुई भेंट से दोनों भावावेश में आ गये थे। फिर दोनों एक दूसरे को बड़ी देर तक देखते रहे।

आओ बैठो फिर बातें होंगी। किसन ने कहा और चाय का आदेश दे दिया।

और क्या खाओगे?

खाने की बात यहां मत कहो, गोपी ने कहा, खाना तो मकान पर खाना होगा।……. तुम टिके कहां हो?

यहीं एक दोस्त के यहां। किसन ने कहा, तो हम दोस्त नहीं हैं?

नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है। तुम्हारा पता ज्ञात होता तो सीधे वहीं आता। मगर तुम इतने दिन से यहां हो, हमें कभी सूचना तक नहीं दी। इसका बहुत अफसोस हैं।

फिर वही बात किसन। भई, जब तुम्हारा पता ही नहीं था तो सूचना कैसे देता। अब मैं यह कहूं कि तुमने जब मकान बदला तो कौन-सी सूचना दी। पता होता तो इस बीच पांच-दस दफा मकान पर आ चुका होता।

यह सब बकवास है गोपी!… अच्छा बताओ, इस वक्त क्या खाना है। चाय ठंडी हो जायेगी।

मैंने कहा न, खाना घर पर होगा। यहां नहीं।

मगर इस वक्त चाय के साथ तो कुछ…

भई, कुछ बिस्कुट भिजवा दो। और मां की कैसी तबियत है।

मजे में हैं। तुम्हें अक्सर याद करती रहती हैं कि गोपी पता नहीं कहां गया? पता नहीं याद करता है कि नहीं।

याद तो तुम सब भी आते हो किसन/गोपी। उन्होंने हमें बड़ा स्नेह दिया है। कई बार सोचा मां कुछ दिनों के लिए यहीं आ जायें तो कितना अच्छा हो। अब तो तुम्हारा मकान भी हो गया है यहीं।

हां, छोटा सा है।

तब तो बहुत अच्छा है। आज के जमाने में अपना एक मकान होना बहुत आवश्यक है चाहे जैसा हो।

कितने बच्चे हैं गोपी?

दो है। एक लड़की है। एक लड़का है। लड़की सातवें में पढ़ती है, और लड़का दसवें का इम्तहान दे रहा है।

यह तो बड़ा अच्छा है। और भाभी की कैसी तबियत है?

ठीक है। घर गृहस्थी देखती हैं। कोई कष्ट उन्हें नहीं है। बच्ची भी घर के काम धंधे में हाथ बंटाती रहती है। इतना कह कर गोपी चुप हो गया। फिर उसने सोचा कि बातचीत में कहीं कुछ कमी है। कहां कमी है?

उसने दो-चार घूंट चाय पी। एक दो बिस्कुट कुटकाये फिर पूछा, अच्छा किसन, तुमने अपनी शादी की कि नहीं?

हां, हो गयी।

मगर मुझे तुमने नहीं सूचित किया।

फिर वही बात करते हो। जब पता ही नहीं था तो कैसे सूचित करता।

हां ठीक है मैं अपनी बात वापस लेता हूं। किंतु मिठाई तो ड्यू है ही।

हां, ड्यू है।

और किसन, बच्चे कितने हैं?

तीन हो गए हैं। चैथा होने को है।

तब तो तुम मुझसे दो कदम आगे बढ़ गये।

हां, समझ सकते हो। किन्तु…।

कुछ नहीं।

कुछ बात तो है है। किसन, तुम मुझसे छिपा रहे हो। मैं देख रहा हूं, तुममें बहुत परिवर्तन आ गया है।

हां, गोपी परिवर्तन तो आना ही चाहिए।

बिना इसके दुनिया आगे नहीं बढ़ सकती है। आदमी आगे नहीं बढ़ सकता है। अपने सामने नयी-नयी समस्याएं आती जा रही हैं। उनका समाधान परिवर्तन में ही है।

यह तो ठीक है, पर मुझसे अपने मन की बात छिपाना कहां का परिवर्तन है।

इस प्रश्न ने किशन को एक झटका दिया। वह कुछ देर तक गोपी को देखता रह गया और मन ही मन उसने अपने को गोपी से नापा। गोपी के पास मकान हो गया है वह किराए के मकान में रहता है। गोपी कितना मस्त है उसे जैसे कोई चिंता ही नहीं है। गोपी की बच्ची काम में मां का हाथ बंटाती है।…. किंतु उसकी एक बच्ची अभी छोटी है। लड़का भी छोटा है। दूसरी बच्ची मुश्किल से डेढ़ वर्ष की है। पत्नी पांच-छह वर्षों से ही चिड़चिड़ी हो गयी है। मां इतना सब करती है…किंतु। और अब उसे चैथे की भी चिंता हो गई है।…. सोचते-सोचते किसन ने निश्चय किया कि अब वह और आगे नहीं बढ़ेगा।…

क्या सोच रहे हो किसन, यह शहर तुम्हारा है। गोपी भी। गोपी का घर भी। मत सोचो कि तुम बेगानी जगह में हो। सामान उठाकर अपने घर आओ। तुम्हारी भाभी बहुत खुश होंगी। कितने दिन हो गये हैं। एक युग ही बीत गया। काश, तुम्होर मकान का पता होता।

किशन, गोपी को देखता रह गया। उसकी बातें हवा की भांति उसे छूकर उड़ गयी। उसकी चाय ठंडी हो गयी। उसने कप उठा कर एक ही सांस में खत्म कर दी। फिर तिपाई से पीठ टिकाकर बैठ गया। जैसे वह अपने मानसिक तनाव को कम कर देना चाहता हो।

गोपी ने देखा किसन कुछ सुस्त हो गया है। उसने कहा, उठ, किसन घर हो आए। यहीं पास ही है। भाभी और बच्चे तुम्हें देखकर बहुत खुश होंगे।….

खुशी तो मुझे भी बहुत होगी, गोपी। और सच पूछो तो मैं इस वक्त बहुत खुश हूं कि तुमसे भेंट हो गयी। तुम बहुत खुश नसीब हो गोपी।

हां, मैं खुशनसीब तो हूं कि तुमसे भेंट हो गयी। कहते हुए गोपी ठहाका मार कर हंस पड़ा। फिर उसने किसन का हाथ पकड़कर चाय की दुकान से बाहर आते हुए कहा, मकान पर चलकर खाना खाएंगे। तुम्हारी भाभी तुम्हें देखकर बहुत खुश भी होंगी। जाने कितने दिन बाद भेंट हुई है।

दस-पंद्रह वर्ष हो गये होंगे।

हां, हो गये होंगे।

और गोपी इन दस-पंद्रह वर्षों में तुम और जवान हो गये हो। मैं बुढ़ा गया।

नहीं किसन, यह तुम्हारा भ्रम है। तुम बुढ़ाए नहीं हो। तुम्हारा मन बुढ़ा गया है। जिसकी छाया में तुम अपने को भिंचा-भिंचा महसूसते हो। यह सब चिंता छोड़ो। आओ, अब तो घर में बैठकर बातें होंगी।

अपने घर जाते हुए गोपी के कदम बहुत तेज थे। किसन को वह अपना नया-नया बनवाया हुआ मकान दिखाना चाहता था। पढ़े-लिखे बच्चे दिखाना चाहता था और ऐसे वातावरण में बैठकर वह किसन से बातें करना चाहता था।

और किसन अपने दोस्त के साथ जाते हुए भी अपने को अजनबी महसूसता जा रहा था। उसके भीतर का उत्साह गोपी के संयोजित परिवार की खुशहाली के आगे बौना हो गया था।

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