आरक्षण के नाम पर रक्तपात आखिर कब तक

सियाराम पांडेय ‘शांत’

आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत निषाद समाज के लोगों ने गाजीपुर में पथराव कर पुलिसकर्मी सुरेश वत्स को मौत के घाट उतार दिया। हमले में आठ अन्य पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया। ये सभी पुलिसकर्मी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा के बाद अपने कार्य स्थल पर लौट रहे थे और लोगों को सुरक्षित मार्ग देने की कोशिश कर रहे थे। आंदोलनरत निषाद नारे लगा रहे थे कि जब तक मांगे पूरी न होगी,खून बहेगा। उन्होंने अपने नारे को सच भी कर दिया। इस घटना की जितनी भी निंदा की जाए,कम है। वैसे यह गहन मंथन का विषय है कि आरक्षण के नाम पर रक्तपात कब तक होता रहेगा।कब तक इस देश के लोग आरक्षण मांगने के लिए सड़क पर उतरते रहेंगे। वह आदर्श स्थिति कब आएगी जब लोग अपनी प्रतिभा और योग्यता के आधार पर नौकरी मांगना पसंद करें।आरक्षण को अपना हक मानने वालों को आज नहीं तो कल यह स्वीकार करना ही होगा कि आरक्षण प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों,वे चाहे जिस किसी भी जाति-धर्म के हों, के हक पर डाका है। उस प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगाए जाने की जरूरत है।आरक्षण ने इस देश का जितना नुकसान किया,उतना नुकसान तो किसी अन्य ने नहीं किया है। डाके का स्वागत नहीं किया जा सकता। बुलंदशहर के स्याना के बाद यह दूसरी घटना है जब उत्तेजित भीड़ ने किसी पुलिस कर्मी को मार डाला है। मुख्यमंत्री ने स्याना के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की मौत के बाद उनकी पत्नी को आजीवन असाधारण पेंशन की घोषणा की है। उस मामले में उन्होंने सुबोध कुमार सिंह के परिवार को 50 लाख का मुआवजा दिया था। सुरेश वत्स की मौत पर भी उन्होंने 40 लाख पत्नी को और 10 लाख माता-पिता को मुआवजे और असाधारण पेंशन की घोषणा की है। आरोपियों पर रासुका लगाने की कवायद हो रही है। निषाद पार्टी ने कहा है कि उसके कार्यकर्ता बेहद अनुशासित हैं,वे किसी की हत्या नहीं कर सकते। जब तक सरकार इस तरह के मामलों में आयोजको को जिम्मेदार नहीं ठहरती,उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करती,तब तक पुलिस का इकबाल कायम नहीं होना है। पुलिस पर हमले बेहद चिंताजनक है। पुलिस के अधिकारियों को इस बावत मंथन करना होगा कि कहीं पुलिड की नीतियां ,उनका कार्य व्यवहार तो इसके लिए दोषी नहीं है। बुलंदशहर की घटना तो विदेशों में भी चर्चा के केंद्र में रही। जब तक पुलिस असली गुनहगारों पर कारर्वाई नहीं करेगी,तब तक अपराधियों का मनोबल तो टूटने से रहा। उत्तेजित भीड़ जब कानून के रखवालों पर हमलावर हो रही है तो आमजन का क्या हस्र होगा,इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। वैसे इस मामले में जिस तरह राजनीति हो रही है,उसे भी मुफीद नहीं कहा जा सकता। अखिलेश यादव इसके लिए योगी सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कुछ वरिष्ठ नौकरशाह तो सीएम योगी का इस्तीफा तक मांगने लगे हैं। जाहिर है कि इस पूरे प्रकरण पर राजनीति हो रही है। मोदी और योगों दोनों ही विपक्षी दलों को खटक रहे हैं। सवाल उठता है कि ये सब घटनाएं राजनीतिक दुरभिसंधि का हिस्सा तो नहीं। आरक्षण को जितनी जल्दी हो, समाप्त कर देने में ही भलाई है। मतों की राजनीति के चक्कर में इस व्यवस्था को बरकरार रखने से देश में अंततः कलह और अशांति का ही जन्म होगा ।आब भी समय है,जब विवाद की इस जड़ को उखाड़ फेंकना चाहिए। दलित,वंचित पिछड़ों को पढ़ाई -लिखाई में सरकार जितनी चाहे,उतनी सुविधा दे लेकिन नौकरी तो योग्यता के आधार पर ही दी जानी चाहिए। देश को आगे ले जाना है तो इतना रिस्क तो लेना ही होगा।अब नेताओं को यह तय करना है कि उन्हें कुर्सी प्यारी है या देश?

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