अध्यात्म है अपने भीतर सम्राट होना

-सद्गुरु जग्गी वासुदेव-

अध्यात्म कायरों और निकम्मों के लिए नहीं है। आप अपने जीवन में कुछ और नहीं कर सकते और सोचते हैं कि मैं आध्यात्मिक हो सकता हूं तो यह संभव नहीं। अगर आपके पास इस संसार के किसी भी काम को बेहतर ढंग से करने की क्षमता और हिम्मत है, तब शायद आप आध्यात्मिक हो सकते हैं। आजकल पूरे समाज के मन में यही धारणा है कि सिर्फ निकम्मे और नालायक लोग ही अध्यात्म की तरफ जाते हैं।

दरअसल इसकी वजह यह है कि आज तथाकथित आध्यात्मिक लोग ऐसे ही हैं। लेकिन यह अध्यात्म नहीं है। अगर आपको अपनी चेतना के शिखर पर पहुंचना है तो वहां एक निपट भिखारी कभी नहीं पहुंच सकता। भिखारी दो तरह के होते हैं। गौतम बुद्ध व उस स्तर के लोग उच्चतम श्रेणी के भिखारी हैं। दूसरे सभी निपट भिखारी हैं। मैं तो कहूंगा कि एक सड़क का भिखारी और राजगद्दी पर बैठा राजा दोनों ही भिखारी हैं, क्योंकि वे हर वक्त बाहर से कुछ मांग रहे होते हैं। सड़क का भिखारी हो सकता है कि पैसा, भोजन या आश्रय मांग रहा हो, जबकि राजा हो सकता है कि किसी दूसरे राज्य पर जीत या सुख जैसी बेकार की चीजें मांग रहा हो।

वास्तव में हर इंसान किसी-न-किसी चीज की भीख मांग रहा है। बुद्ध ने केवल अपने भोजन के लिए भिक्षा मांगी, बाकी चीजों के लिए वे आत्मनिर्भर थे, जबकि दूसरे सभी लोग भोजन को छोड़ बाकी सभी चीजों के लिए भीख मांगते हैं। आध्यात्मिक होने का अर्थ है- अपने भीतर सम्राट होना। कोई व्यक्ति अपनी पूरी चेतना में क्या किसी ऐसे जीवन का चुनाव करेगा, जहां उसे कोई चीज किसी और से मांगनी पड़े? आपके भीतर सभी चीजें मौजूद हैं, आपको इन्हें बाहर नहीं खोजना। यहां तक कि किसी के संग-साथ की भी आपको जरूरत नहीं है। हां, अगर दूसरे इंसान को इसकी जरूरत है तो आप उसे साथ दे सकते हैं। इसका मतलब है कि अब आप भीतर से भिखारी नहीं रह गए हैं। हो सकता है कि केवल बाहरी चीजों के लिए आपको बाहर संसार में जाना पड़े। यही परम मुक्ति है।

अगर आप शिव से मिलना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि उनकी शर्तों पर मिला जाए। वे एक निपट भिखारी से मिलने नहीं आने वाले। आप या तो उनसे उनकी शर्तों पर मिलें या बस विसर्जित हो जाएं। बस यही दो रास्ते हैं। यही ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग का मतलब है। देखने में प्रेम या भक्ति का मार्ग बहुत आसान लगता है। यह आसान है भी, लेकिन इस मार्ग पर ज्ञान-मार्ग की अपेक्षा कहीं ज्यादा गड्ढे हैं, जिनमें गिरने का खतरा बना रहता है। ज्ञान-मार्ग पर आपको पता होता है कि आप कहां जा रहे हैं। अगर इस राह पर आप गिरते हैं तो आपको पता चल जाता है। भक्ति में कुछ पता नहीं चलेगा। यह ऐसा ही मार्ग है। आप अपने बनाए भ्रमों के जाल में फंसे होते हैं और आपको पता नहीं चलता। ज्ञान में ऐसा नहीं है। हरेक कदम जो आप बढ़ाते हैं, आपको पता होता है। विकास के हर कदम के बारे में आपको जानकारी होती है। मैं यह नहीं कह रहा कि भक्ति-मार्ग एक मुश्किल रास्ता है, लेकिन यह बहादुरों का रास्ता है, कायरों का नहीं।

हालांकि हर इंसान में यह करने की संभावना है। अगर इंसान अपनी सीमाओं से ऊपर उठ जाए तो उसमें इसे करने की क्षमता है। बात सिर्फ इतनी है कि इसे करने की उसके भीतर अटूट चाह है या नहीं। उसे सोचना होगा कि यही पहली और अंतिम चीज है, जो मैं अपने जीवन में चाहता हूं। फिर उसकी पूरी ऊर्जा खुद-ब-खुद उसी दिशा में लग जाएगी।

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