(व्यंग्य) एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका से इंटरव्यू

  -मनोज कुमार झा- हमारे मुहल्ले में एक प्राइवेट स्कूल है जिसके संचालक एक प्रॉपर्टी डीलर होने के साथ ही स्कूल के बेनामी डायरेक्टर भी हैं। उनकी पत्नी स्कूल की प्रिंसिपल हैं। यह स्कूल बाकायदा सीबीएसई से संबद्ध है और इसके दो ब्रांच और भी हैं। इस स्कूल के पास अपना निजी भवन है। यह दो मंजिला है। ऊपर की मंजिल पर द कमरे, रसोई और एक बाथरूम स्कूल मालिक के आवास के रूप में आरक्षित है, बाकी के कमरों में कक्षाएं लगती हैं। पहली मंजिल यानी ग्राउंड फ्लोर पर…

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कहानी: ये कैसा इंसाफ

-लतिका जोशी- नीमा शादी के बाद आज पहली बार घर आई है लेकिन घर पर तो आज भी शादी वाला माहौल है। पंडित जी शाम को होने वाली पूजा की तैंयारी में घी, फूल, कुमकुम, दिए के लिए हर 2 मिनट बाद ये लाओ वो लाओ का आलाप कर रहें हैं और नीमा की मां और नानी दौड़ दौड़ के उनकी सारी मांगों को कहते ही पूरा करने के अभियान में जुटी हैं और वहीं दूसरी ओर नीमा के पापा अपने दोस्तों रिश्तेदारों को अपनी बेटी के ससुराल के ठाटबाट…

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(व्यंग्य) डेंगू, चिडि़या, गाय और भावुकता

-निर्मल गुप्त- डेंगू क्या आया, बेचारी चिडि़यों और गली मोहल्लों में भटकने वाली गायों को पीने के लिए साफ पानी मिलना दूभर हो गया। सबको पता लग गया कि डेंगू वाला मच्छर साफ पानी में पनपता है। चिडि़यों के लिए घर की छत पर रखे जलपात्र और सार्वजनिक नांद रीती कर दी गईं। एक की वजह से दूसरे की जान सांसत में आ गई। अब देखिए न, बिल्ली छीके पर टंगी दूध मलाई की मटकी ढूंढ़ती घर में आई तो सारे चूहे बिल में जा छिपे, अलबत्ता वह मुंडेर पर…

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कहानी: समय की तंगी

-सुनील सक्सेना- जगदीश के पिता के देहांत की सूचना उसे सुबह-सुबह रमाकांत के फोन से मिली। कुछ देर में वह जगदीश के घर पहुंच गया। लेकिन सुबह रमाकांत की बातों, फिर अपनी पत्नी के हाव-भाव और जगदीश के घर पर भी उसे पिता जी के देहांत के दुख से ज्यादा किसी और बात की चिंता की अनुभूति हो रही थी। कड़ाके की ठंड। सूरज नदारद। कोहरे का राज। रविवार का दिन हो, तो कोई अहमक ही होगा जो रजाई से निकलकर खूबसूरत सुबह को बरबाद करे। सुबह-सुबह जब मोबाइल की…

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(व्यंग्य) गधे ने जब मुंह खोला

-अशोक गौतम- मैंने रोज की तरह लाला दयाराम की बरसों से बन रही हवेली के लिए सूरज निकलने से पहले अपने पुश्तैनी गधे के पोते के पड़पोते पर रेत ढोना शुरू कर दिया था। जहां तक मेरी नालिज है न गधे के पुरखों ने मेरे पुरखों से इस रिश्ते के बाबत कोई शिकायत की थी और न ही इस गधे ने मुझसे आज तक कोई शिकायत की है कि मैं सूरज के काम पर आने से पहले क्यों बड़े लोगों के बन रहे महलों के लिए रेत बजरी ढोने में…

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कहानी: प्रेम क्या होता है?

-पंकज सुबीर- खिड़की के बाहर गर्मी की रात बिखरी हुई है, गर्मी की गुनगुनी-सी रात। खिड़की से सटकर लगी हुई रातरानी की झाड़ी के फूलों की मादक गंध खिड़की के परदे से अठखेलियां कर रही हवा के साथ कमरे में आ रही है। खिड़की के छज्जे पर लदी हुई रंगून क्रीपर की तलर भी लाल, सफेद और गुलाबी गुच्छों के कारण झुकी जा रही है। खिड़की के पार दूर आसमान में आधा अधूरा चांद टंका हुआ है। ग्रीष्म की धूप को दिन भर सहन करने के बाद झुलसे पेड़ों की…

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(व्यंग्य) इस का इलाज कराओ भाइयो

रामजस एक बार संगीत सुनने गए थे. असल में जाने का उन का जरा भी मन नहीं था, लेकिन पड़ोसियों ने ऐसा दबाव डाला कि वे टाल नहीं सके. पड़ोसियों ने कहा, टिकट भी हम ले लेंगे मगर चलो. जिंदगी में एक बार तो संगीत सुन लो. कितना बड़ा कलाकार आया है अपने गांव में. बारबार नहीं मिलते ऐसे मौके.रामजस ने बहुत कहा कि मुझे कुछ लेनादेना नहीं है शास्त्रीय संगीत से. क्या शास्त्रीय और क्या संगीत. मैं मजे में हूं. घर और खेत में ही मेरा सारा दिन गुजर…

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(कहानी) झूठा सच

-कुमुद भटनागर- जीवनलाल ने अपने दोस्त गिरीश और उस की पत्नी दीपा को उन की बेटी कंचन के लिए उपयुक्त वर तलाशने में मदद करने हेतु अपने सहायक पंकज से मिलवाया. दोनों को सुदर्शन और विनम्र पंकज अच्छा लगा. वह रेलवे वर्कशौप में सहायक इंजीनियर था. परिवार में सिवा मां के और कोई न था जो एक जानेमाने ट्यूटोरियल कालेज में पढ़ाती थीं. राजनीतिशास्त्र की प्रवक्ता कंचन की शादी के लिए पहली शर्त यही थी कि उसे नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहा जाएगा. स्वयं नौकरी करती सास को बहू…

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(कहानी) मिर्च-मसाले

-रीता कुमारी- हर रिश्ते में कुछ खट्टा तो कुछ मीठा होता है, मगर सास-बहू के रिश्ते की बात ही अलग है। यहां तो खट्टे-मीठे के अलावा मिर्च-मसाला भी खूब होता है। जिस तरह सेहत के लिए हर स्वाद जरूरी है, उसी तरह रिश्ते के इस कडवे-तीखे स्वाद के बिना भी जिंदगी बेमजा है। यूनिवर्सिटी के काम से एकाएक मुझे मुजफ्फरपुर जाना पडा। मैं काम खत्म करके सीधे अपने बचपन की सहेली निधि के घर जा पहुंची, जो वहीं अपने पति, बच्चों और सास के साथ रहती थी। बरसों बाद मुझे…

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(व्यंग्य) : टिकट-टिकट-महाविकट

सिर्फ एक अदद टिकट पाने की खातिर तन-मन और धन से कुर्बान। बस येन केन प्रकारेण मिल भर जाए यह अनमोल खजाना, फिर तो अपनी खुशकिस्मत सी हो चुकी मुट्ठी में है सारा जमाना। हर तरफ हरियाली ही हरियाली और बहारें चलायमान सी दिखने-प्रतीत होने लग पड़ती हैं, यह तो पक्का मान कर चलिए भाई। ——————————————– भाई लागों… एक होता है टिकट। अब आप चाहे मानो या न मानो, पर इस नाचीज का दिल दीवाना यह मानने को मजबूर हो चला है कि यह होता है बड़ा विकट। तीन अक्षर…

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