नवरात्रों की बची पूजन सामग्री का ऐसे करें उपयोग, आएगी सुख-समृद्धि

पूजा में भाव के साथ साथ भक्त के द्वारा भगवन को अर्पित की गई वस्तुओं का भी अपना महत्व होता है। सभी लग अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार भगवन को भेंट एवं सामग्री अर्पण करते हैं। भावना से अर्पण की हुई अल्प वस्तु को भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं। ज्यादातर लोग पूजन में जो सामग्री बच जाती है उसे अगले ही दिन पानी में प्रवाहित कर देते हैं। लेकिन इस बात को शायद कम ही लोग जानते होंगे कि बची हुई पूजन सामग्री से भी हम अपने सुख-समृद्धि और वैभव…

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सफलता का बड़ा सिद्धांत: आत्मनिर्भर बनो

सभी जानते हैं कि हाथी सिंह की अपेक्षा अधिक बलवान जीव है। उसका आकार बड़ा, भारी और बलवान है, परन्तु फिर भी एक अकेला सिंह हाथियों के झुंड को भगाने में समर्थ होता है। शेर की ताकत का रहस्य क्या है? केवल यह कि हाथी अपने शरीर पर भरोसा करता है, जबकि शेर अपनी शक्ति पर भरोसा करता है। हाथी बनाम शेर हाथी चालीस-पचास, सौ-सौ या कभी-कभी दो-दो सौ का झुण्ड बनाकर चलते हैं। जब कभी वे विश्राम करते हैं, तो हमेशा एक बलशाली हाथी को पहरेदार के रूप में…

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क्या है तंत्र-मंत्र और इसका महत्व

मंत्र:- मननेन त्रायते इति मन्त्रः -अथार्त जो मनन करने पर त्राण दे यानी लक्ष्य पूर्ति कर दे, वह मन्त्र है। दूसरे शब्दों मे अगर समझें तो जब शब्दों के समूहों को एक ध्वनि मे पिरोकर उच्चारण किया जाता हे तो उसे मंत्र कहते हैं। मंत्र का प्रयोग विधि के माध्यम से सकारात्मक प्रयोजनों के लिए दिव्य शक्ति का आह्वान करने के लिए किया जाता है। मंत्र के लगातार जाप से उत्पन्न संवेग, वायुमंडल में छिपी शक्तिया को एक जगह एकत्रित एवम नियंत्रित करता है । मंत्र में अद्भुत और असीमित…

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अध्यात्म से ही स्थाई समाधान संभव

सामयिक समस्याओं का स्वरूप समझ लेने के उपरांत उपचार सरल होना चाहिये। रोग का सही निदान हो जाने पर चिकित्सा की आधे से अधिक कठिनाई हल हो जाती है। इन दिनों रुग्णता, उद्विग्नता, गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, अव्यवस्था, निष्ठुरता के आधार पर पनपने वाली अनेकानेक कठिनाइयों के घटाटोप छाए हुए हैं। विकृतियां और विपन्नताएं:- विकृतियों और विपन्नताओं के आकार प्रकार अनेक हैं, पर उनका मूलभूत कारण एक है- आदर्शों के प्रति अनास्था। घटाएं बरसाती हैं, तो जल जंगल एक होते हैं, पर पावस के समाप्त होते ही न नाले इतराते हैं,…

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ज्ञान की पवित्रता को समझिए

गीता भारतीय चिन्तन का अद्भुत ग्रंथ है। उसके श्लोकों के अध्ययन और विश्लेषक से मानव जीवन के अनेकानेक रहस्यों का उद्धाटन होता है। पढ़ने और समझने से एक विशेष आनंद की अनुभूति होती है। गीता का उपदेश तो आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपने कर्तव्य के प्रति सजग करने को दिया था किन्तु उसके श्लोक समय की इतनी लंबी अवधि बीत जाने के उपरांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, बल्कि यूं भी कह सकते हैं कि इतने लंबे अंतराल के बाद जब…

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जब हनुमानजी की भगवान श्रीराम से हुई पहली-पहली भेंट

हनुमानजी सुग्रीव आदि वानरों के साथ ऋष्यमूक पर्वत की एक बहुत ऊंची चोटी पर बैठे हुए थे। उसी समय भगवान श्रीरामचंद्रजी सीताजी की खोज करते हुए लक्ष्मणजी के साथ ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुंचे। ऊंची चोटी पर वानरों के राजा सुग्रीव ने उन लोगों को देखा। उसने सोचा कि ये बालि के भेजे हुए दो योद्धा हैं, जो मुझे मारने के लिए हाथ में धनुष-बाण लिये चले आ रहे हैं। दूर से देखने पर ये दोनों बहुत बलवान जान पड़ते हैं। डर से घबराकर उसने हनुमानजी से कहा-हनुमान! वह देखो,…

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दो रातों के बीच एक दिन या दो दिनों के बीच एक रात!

यदि तुम अप्रसन्न हो तो इसका सरल सा अर्थ यह है कि तुम अप्रसन्न होने की तरकीब सीख गए हो। और कुछ नहीं! अप्रसन्नता तुम्हारे मन के सोचने के ढंग पर निर्भर करती है। यहां ऐसे लोग हैं जो हर स्थिति में अप्रसन्न होते हैं। उनके मन में एक तरह का कार्यक्रम है जिससे वे हर चीज को अप्रसन्नता में बदल देते हैं। यदि तुम उन्हें गुलाब की सुंदरता के बारे में कहो, वे तत्काल कांटों की गिनती शुरू कर देंगे। यदि उन्हें तुम कहो, कितनी सुंदर सुबह है, कितना…

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तनाव को लेकर एक और तनाव

तनाव को लेकर एक और तनाव। जीवन में अनेक समस्याएं हैं। समस्याएं पीडि़त करती हैं। लोग तनाव में आते हैं लेकिन भारत के लोग तनाव को लेकर प्राय चिकित्सकों के पास नहीं जाते। दुनिया के तमाम देशों में मनोविश्लेषकों के पास लम्बी कतारे हैं। संपन्न लोग निजी मनोचिकित्सक भी रखते हैं लेकिन भारत में मनोविश्लेषकों के पास भीड़ नहीं है। मनोविश्लेषक हैरान हैं। सो इस पेशे के समर्थक भारत को पिछड़ा बताते हैं। मनोविश्लेषक तनाव को रोग बताते हैं। वे तमाम प्रश्न पूछते हैं परामर्श देते हैं। इसे काउंसिलिंग कहा…

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पूर्वजों की स्मृति का पक्ष है-श्राद्धपक्ष

श्राद्धपक्ष अपने पूर्वजों की स्मृति का पक्ष है। इस काल में अपने पूर्वजों-पितरों के निमित दान-आदि की परम्परा है। कहते हैं कि पृथ्वीलोक में जैसा दान मनुष्य द्वारा किया जाता है वैसा ही सामान उसे मृत्यु के बाद उपभोग हेतु स्वर्गलोक में प्राप्त होता है। इस संबंध में महादानी कर्ण से जुड़ी महाभारत की एक प्रसिध्द कथा है- कर्ण अपनी दानशीलता के लिये जाने ही जाते थे। इनका नियम था कि वे सोने का दान करते थे। स्वर्णदान करने के कारण, मृत्यु उपरांत इन्हें उपभोग के लिये स्वर्ण निर्मित सामग्री…

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चले जाने के बाद भी लोक में रहता है मनुष्य

कोई भी मनुष्य जब अपने पूर्वजों का श्राद्ध करता है, तब किसका श्राद्ध करता है, किस चीज का श्राद्ध करता है? क्या वह आत्मा का श्राद्ध करता है? नहीं। आत्मा सर्वव्यापी अर्थात् विभु है। उसके लिए मरण नहीं है, स्थानांतर अथवा लोकांतर नहीं है। इसलिए आत्मा के श्राद्ध का तो प्रश्न ही नहीं उठता। तब क्या मनुष्य देह का श्राद्ध करता है? नहीं, देह का भी नहीं। देह की तो राख या मिट्टी हो जाती है। कदाचित् देह अन्य प्राणियों का आहार बन कर उनके साथ एकरूप भी हो गई…

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