कैसे करें शाश्वत मूल्यों की सुरक्षा?

-आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि- कोई भी समाज अपने समय के साथ जीता और चलता है। समय बदलने के साथ ही अनेक सारी मान्यताएं तथा परम्पराएं बदल जाती हैं। जहां नहीं बदलती हैं वहां यह माना जाता है कि यह समाज दृढ़ और कट्टर है। जनसंख्या नियंत्रण का मामला हो या विकास की अवधारणा या फिर अंधविश्वास-अगर ये समय के साथ अपने आपको बदल नहीं पाए तो उसे देश या समाज की जड़ता मानी जाती है। हमें पहले यह जानना चाहिए कि हम किस समय और समाज व्यवस्था में जी रहे हैं।…

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आप भी जान लीजिए भगवान को नैवेद्य चढ़ाने के 12 खास नियम

देवताओं का नैवेद्य यानी देवी-देवताओं के निवेदन के लिए जिस भोज्य द्रव्य का प्रयोग किया जाता है, उसे नैवेद्य कहते है। उसे अन्य नाम जैसे भोग, प्रसाद, प्रसादी आदि भी कहा जाता है। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत है देवताओं को नैवेद्य अर्पित करने के कुछ नियम, जिन्हें अपना कर आप भगवान की कृपा प्राप्त कर सकते है। नैवेद्य चढ़ाने के नियम… -देवता को निवेदित करना ही नैवेद्य है। सभी प्रकार के प्रसाद में निम्न पदार्थ प्रमुख रूप से रखे जाते हैं-दूध-शकर, मिश्री, शकर-नारियल, गुड़-नारियल, फल, खीर, भोजन इत्यादि पदार्थ।…

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अध्यात्म है अपने भीतर सम्राट होना

-सद्गुरु जग्गी वासुदेव- अध्यात्म कायरों और निकम्मों के लिए नहीं है। आप अपने जीवन में कुछ और नहीं कर सकते और सोचते हैं कि मैं आध्यात्मिक हो सकता हूं तो यह संभव नहीं। अगर आपके पास इस संसार के किसी भी काम को बेहतर ढंग से करने की क्षमता और हिम्मत है, तब शायद आप आध्यात्मिक हो सकते हैं। आजकल पूरे समाज के मन में यही धारणा है कि सिर्फ निकम्मे और नालायक लोग ही अध्यात्म की तरफ जाते हैं। दरअसल इसकी वजह यह है कि आज तथाकथित आध्यात्मिक लोग…

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अध्यात्म है अपने भीतर सम्राट होना

-सद्गुरु जग्गी वासुदेव- अध्यात्म कायरों और निकम्मों के लिए नहीं है। आप अपने जीवन में कुछ और नहीं कर सकते और सोचते हैं कि मैं आध्यात्मिक हो सकता हूं तो यह संभव नहीं। अगर आपके पास इस संसार के किसी भी काम को बेहतर ढंग से करने की क्षमता और हिम्मत है, तब शायद आप आध्यात्मिक हो सकते हैं। आजकल पूरे समाज के मन में यही धारणा है कि सिर्फ निकम्मे और नालायक लोग ही अध्यात्म की तरफ जाते हैं। दरअसल इसकी वजह यह है कि आज तथाकथित आध्यात्मिक लोग…

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योगदा आश्रम में शरद संगम के दौरान ईश्वरानुभूति की बही बयार

संगम मे देश-विदेश के लोगों ने लगाई डूबकी शरद संगम में जो स्वर्ग का अनुभव हो रहा है, या जो स्वर्ग का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं, इस स्वर्ग को आप अपने घर में भी महसूस करें और इस ऐहसास को अपने घर तक ले जाये, क्योंकि ये आनन्द, ये ईश्वरानुभूति ही, मनुष्य को परम आनन्द की ओर ले जाती हैं। ये बातें आज शरद संगम के अंतिम दिन समापन समारोह में योगदा सत्संग आश्रम के स्वामी स्मरणानन्द ने कही। उन्होंने मुख्य पंडाल में देश-विदेश से आये भक्तों को संबोधित…

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शरद संगम में शक्ति संचार व्यायाम, हं-सः एवं ओम प्रविधि का भक्तों ने लिया लाभ

रांची। शरद संगम में शक्ति संचार व्यायाम, हं-सः प्रविधि तथा ओम प्रविधि से भी भक्तों का साक्षात्कार कराया गया। उन्हें बताया गया कि योगदा के प्रत्येक साधकों को इन तीनों विधाओं में पारंगत होना उतना ही आवश्यक है, जितना प्रत्येक प्राणियों को जीवित रखने के लिए भोजन, पानी और हवा की आवश्यकता है। शरद संगम में भाग ले रहे साधकों-भक्तों को प्रशिक्षित कर रहे ब्रह्मचारी शीलानन्द एवं ब्रह्मचारी निष्ठानन्द ने स्पष्ट रुप से कहा कि जब तक आप इन तीनों विधाओं में एकाग्रता को नहीं लायेंगे, ईश्वर की अनुभूति होना…

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मंदिरों की मणिमाला का मोती है जगत का अम्बिका मंदिर

सरस्वती, नृत्य भाव में गणपति, महिषासुर मर्दिनी, नवदुर्गा, वीणाधारिणी, यम, कुबेर, वायु, इन्द्र, वरूण, प्रणय भाव में युगल, अंगड़ाई लेते हुए व दर्पण निहारती नायिका, शिशु क्रीडा, वादन, नृत्य आकृतियां एवं पूजन सामग्री सजाये रमणी आदि कलात्मक प्रतिमाओं का अचंभित कर देने वाली मूर्तियों का खजाना और आदित्य स्थापत्य कला को अपने में समेटे जगत का अम्बिका मंदिर राजस्थान के मंदिरों की मणिमाला का मोती कहा जा सकता है। मूर्तियों का लालित्य, मुद्रा, भाव, प्रभावोत्पादकता, आभूषण, अलंकरण, केशविन्यास, वस्त्रों का अंकन और नागर शैली में स्थापत्य का आकर्षण इस शिखरबंद…

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जानिए श्रीकृष्ण की प्रिय वस्तुओं के बारे में…

बांसुरी भगवान श्री कृष्ण, को अत्यंत प्रिय है, क्योंकि बांसुरी में तीन गुण है। पहला बांसुरी मं गांठ नहीं है। जो संकेत देता है कि अपने अंदर किसी भी प्रकार की गांठ मत रखो यानी मन में बदले की भावना मत रखो। दूसरा बिना बजाये यह बजती नहीं है। मानो बता रही है कि जब तक ना कहा जाए तब तक मत बोलो। और तीसरा जब भी बजती है मधुर ही बजती है। जिसका अर्थ हुआ जब भी बोलो, मीठा ही बोलो। जब ऐसे गुण किसी में भगवान देखते हैं,…

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हर संसारी प्राणी अपनी सुरक्षा के लिए शरण की खोज करता है…

प्राणी उपयुक्त शरण मिलने पर उसे स्वीकार भी कर लेता है। बहिर्दर्शी व्यक्ति अपने पारिवारिक जनों को शरण मानता है। परिवार के लोग किसी सक्षम सदस्य को शरण मानते हैं। किंतु वे तुम्हें त्राण और शरण देने में समर्थ नहीं हैं और तुम उनको त्राण या शरण देने में समर्थ नहीं हो। यह आगम-वाणी मनुष्य को अपनी सही स्थिति का बोध देती है। वह जब चारों ओर से अत्राण और अशरण होकर असहाय हो जाता है, उस समय उसकी अंतमुखी चेतना में चार प्रकार की शरण आविर्भूत होती है-अर्हत, सिद्ध,…

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सारी मनोकामनाऐं पूर्ण करते हैं अष्ट विनायक

भगवान गणेश यूं तो अपने सभी स्वरूपों में पूर्ण होते हैं। भगवान गणेश शिव के गणों के प्रधान देव हैं। भारत भूमि में हर कहीं गणेश जी के विविध स्थान हैं। इन स्थानों में सभी स्थान प्रमुख और जागृत हैं। अष्टविनायक से तात्पर्य है आठ गणेश जी। ये आठ गणेश अति प्राचीन हैं। इन मंदिरों में भगवान गणेश की जागृत शक्तियां हैं। अष्टविनायक के 8 पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में हैं। मंदिरों का पौराणिक महत्व व इतिहास बहुत ही लोकप्रिय है। इन गणपतियों का उल्लेख मुद्गल…

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