सरकार ने जनजातियों के विकास के लिए 3 साल में 63 हजार करोड़ दिए

नई दिल्ली। पिछले तीन वर्षों 2014-15 से 2016-17 तक कुल 35 विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों ने 62 हजार 947.82 करोड़ रुपये का इस्तेमाल किया। 2014-2015 के दौरान 19 हजार 920.72 करोड़ रुपये, 2015-2016 के दौरान 21 हजार 216.54 करोड़ रुपये खर्च किए गए और 2016-2017 के दौरान 21 हजार 810.56 करोड़ रुपये खर्च किए गये। सभी मंत्रालयों में से 2014-15 के दौरान स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग ने सबसे ज्यादा 4707.15 करोड़ खर्च किए, उसके बाद जनजातीय कार्यों में 3832.20 करोड़ रुपये तथा ग्रामीण विकास में 3314.27 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। जनजातीय मामलों के राज्यमंत्री जसवंत सिंह भाभोर ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि 2015-2016 और 2016-2017 के दौरान, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने सबसे अधिक राशि क्रमशः 4472.26 करोड़ और 4793.96 करोड़ रुपये खर्च किए| उसके बाद स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग ने टीएसपी में (क्रमशः 4287.24 करोड़ और 4343.98 करोड़) खर्च किए। जनवरी, 2017 में बिजनेस नियमों का आवंटन (एबीआर) संशोधित किया गया है| इसके तहत जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) को केन्द्रीय मंत्रालयों के अनुसूचित जनजातीय घटक (एसटीसी) निधियों की निगरानी की जिम्मेवारी दी गई है| इसकी रूपरेखा नीति आयोग द्वारा तैयार की गई है। मंत्रालय ने 2017 से ही ऑनलाइन निगरानी प्रणाली उपलब्ध कराई है। इस ढांचे में योजनाओं के तहत एसटी के कल्याण के लिए आवंटन की निगरानी की गई है| आवंटन के जरिए व्यय की निगरानी, शारीरिक प्रदर्शन और परिणाम निगरानी की भी व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, समन्वय और निगरानी के लिए लाइन मंत्रालयों / विभागों में नोडल अधिकारी भी नामित किए गए हैं। मंत्रालय/विभागवार प्रदर्शन की समीक्षा संयुक्त रूप से एमओटीए और नीति आयोग द्वारा की जाएगी। जनजातीय उप योजना (टीएसपी) के तहत योजनाओं का कार्यान्वयन की पूरी जिम्मेदारी संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों / विभागों और राज्य सरकारों की है।

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