(व्यंग्य) वक्त तो बाबाओं का भी आता है प्राइम टाइम पर

वक्त तो बाबाओं का भी आता है प्राइम टाइम पर। यूं उनके फलने-फूलने के तो सब दिन होते हैं। कहा भी है कि हर दिन दिवाली संत की। लेकिन दिवाली पर भी सबका पत्ता कहां लगता है, ज्यादातर का तो दीवाला ही निकलता है। पर संत को इम्युनिटी हासिल होती है। इसीलिए तो वे दिन-दूनी और रात चौगुनी तरक्की करते हैं। उनकी रफ्तार से बस मुल्क ही तरक्की नहीं कर पाता। वरना तो हमारी विकास दर डबल डिजीट में तो क्या ट्रिपल डिजीट तक भी पहुंच सकती थी। पर मुल्क उनके कदम से कदम मिला ही नहीं पाता, हांफ जाता है और पीछे छूट जाता है। वैसे ही जैसे दुनिया भर के बाजारों में चीनी माल अपना झंडा गाड़ देता है और हमारे निर्यात पिछड़ जाते हैं। बड़े से बड़ा विकास पुरुष भी मुल्क को उनके मुकाबले में नहीं ला सकता।

पर एक दिन तो बाबाओं का भी आता ही है। हालांकि जैसे संत की हर दिन दिवाली होती है वैसे तो चोरों के भी सभी दिन होते हैं, साह का तो एक ही दिन आता है। यह अलग बात है कि वही भारी पड़ जाता है। इसी तरह नेताओं के सब दिन होते हैं। उनकी महानता के नहीं होते तो उनके भ्रष्टाचार और घोटालों के तो होते ही हैं। उनकी सेटिंग के, किसी फाइव स्टार होटल या फार्म हाउस में उनकी मीटिंग के, उनके भाई-भतीजावाद के होते हैं। परिवार और पारिवारिक संबंध फिर चर्चा में हैं। सुषमाजी और वसुंधराजी से ललित मोदी के कई-कई वर्षों पुराने पारिवारिक संबंध हैं, जिन्हें आज तक निभाया जा रहा है। पक्षपात करने से बेशक नकारा जा रहा हो, पर पारिवारिक संबंधों से कोई नहीं नकार रहा।

असल बात यह है कि सब दिन तो नेताओं के ही होते हैं, पर वक्त तो बाबाओं का भी आता है प्राइम टाइम पर। यह वैसे नहीं आता है, जैसे एक दिन साह का आता है। संतों के दिन संतई के पहले ही दिन से फिरने लगते हैं। और बारह बरसों की तपस्या आजकल कोई नहीं करता। दस बरस में तो राधे मां बताते हैं कि एक हजार करोड़ की संपत्ति बना चुकी। इसी तरह हजारों करोड़ आसाराम बापू ने कोई बारह या चौदह बरस की तपस्या के बाद नहीं बनाए। चौदह बरस का बनवास रामजी काट गए, बारह बरस का बनवास पांडव काट गए। बरसों-बरस की तपस्याएं बहुत से संत कर गए। ज्यादा से ज्यादा बाबा रामदेव ने योग में महारत हासिल करने के लिए कुछ बरस जरूर लगाए होंगे। पर वे वैसे संत भी नहीं हैं।

पर वक्त तो बाबाओं का भी आता ही है, प्राइम टाइम पर। वैसे ही जैसे भ्रष्ट नेताओं का आता है, जब वे किसी घोटाले में घिरने लगते हैं, फंसने लगते हैं और एक के बाद एक पकड़े जाने लगते हैं। वैसे ही जैसे बड़े-बड़े अफसर किसी महाकाय घोटाले में फंसते हैं और एक के बाद एक पकड़े जाने लगते हैं। जैसे घोटालों का सीजन आता है,तो एक के बाद एक घोटाले खुलने लगते हैं। लगने लगता है जैसे कि देश में घोटालों के अलावा कुछ नहीं हो रहा। वैसे ही जैसे बलात्कार कांड होने लगते हैं तो लगने लगता है जैसे बलात्कार के अलावा और कुछ नहीं हो रहा। जैसे नेताओं के फंसने का सीजन आता है तो एक के बाद एक नेता फंसने लगते हैं।

इसी तरह बाबाओं के फंसने का सीजन चल रहा है। जैसे आसाराम बापू के फंसने के वक्त पता नहीं नित्यानंद स्वामी और कौन-कौन से बाबा दुराचार में फंसे। वैसे ही इन दिनों राधे मां के फंसने के बाद सारथी बाबा और कौन-कौन से बाबा लाइफ स्टाइल के चक्कर में फंस गए। तो जी, कभी ना कभी सबका वक्त आता है। वैसे ही बाबाओं का भी वक्त आता है प्राइम टाइम पर, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने का।

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