(व्यंग्य) पितृपक्ष में एक पुण्यात्मा

-वीरेन्द्र सरल-

जब एक पुण्यात्मा चित्रगुप्त जी के दफ्तर में पन्द्रह दिन के लिए अर्जित अवकाश का आवेदन लेकर प्रवेश किया तो चित्रगुप्त जी चैंक गये। उन्होने पूछा-ये सब क्या है। आप इतने लम्बे समय तक स्वर्ग से बाहर रहेंगे तो स्वर्ग का क्या होगा, पता है आपको? पुण्यात्मा ने कहा-सर आज पता नहीं कैसे अचानक मेरे दिमाग मे यह विचार आया कि अभी जम्बूद्वीप, आर्यवर्त, देव भूमि और ना जाने क्या-क्या नाना अलकंरणों से अलकृंत मेरे देश में पितृ पक्ष का पर्व चल रहा है। मैंने सुना है कि इस समय वंशज अपने पूर्वजों का पुण्य स्मरण करते हैं और उनके अधूरे कार्यो को आगे बढ़ाते हुए पूर्ण करते है। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए मैंने अपनी कुर्बानी दी थी, देह छोड़ते समय मेरे भी बहुत से स्वप्न अधूरे थे। मैं अपने देश को खुशहाल देखना चाहता था। सभी देशवासियों को सुखी और सम्पन्न करने का मेरा लक्ष्य था। अब तो बहुत समय बीत चुका है शायद मेरे अधूरे स्वप्न अब पूरे हो गये होगे। जिस आदर्श समाज की कल्पना मैंने अपने जीवन काल में की थी अब वह साकार हो गया होगा। देश भय, भूख और भ्रष्ट्राचार से मुक्त हो गया होगा। क्यों न एक बार अपने वंशजो से जाकर मिला जाय। वे सब मुझे अचानक अपने बीच पाकर खुशी से उछल पड़ेंगे। मेरा वहां जाना उनके लिए सरप्राइज गिफ्ट के समान होगा। प्लीज सर, बस पन्द्रह दिन के लिए मेरी यह छुट्टी स्वीकृत कर लीजिए। चित्रगुप्त जी ने उन्हें समझाने की काफी कोशिश की पर वह पुण्यात्मा अपनी जिद पर अड़ा रहा। अन्ततः हार कर चित्रगुप्त ने उनकी भावना का सम्मान करते हुए उनकी छुट्टी स्वीकृत कर ली। पुण्यात्मा ने प्रसन्नता से चित्रगुप्त को थैंक्यू सर कहा और उस कार्यालय से बाहर निकल आए। अब पुण्यात्मा ने एक गरीब आदमी का भेष धारण किया और रात में ही यहां आने के लिए निकल पड़े। यहां पहुंचते-पहुंचते रात बीत गई। चलते-चलते सूरज सिर पर चढ़ आया था। अभी वे एक महानगर में थे। दोपहर का समय था पर वहां स्ट्रीट लाइट वैसे ही जल रही थी जैसे रात में किसी गांव का दिल जल रहा हो। तेज धूप से उनकी हालत वैसे ही खराब हो रही थी जैसे बढ़ती महंगाई में आम आदमी की और गला प्यास से वैसे ही सूखा जा रहा था जैसे सत्तालोलुपों के हृदय की संवेदना सूख रही है। उन्होंने पानी मांगने के लिए एक दुकान पर ठहर कर दुकानदार से कहा- क्या एक गिलास पानी मिलेगा। दुकानदार ने उन्हें अजीब से नजरों से देखकर कहा-पानी बोतल बीस रूपये और पाऊच पांच रूपये कौन सा दूं?यह सुनकर पुण्यात्मा को चक्कर आ गया। वे सोचने लगे, पानी भी बेचने की चीज हो गई? वे पास वाले एक चाय ठेले पर जाकर बैठ गये। ठेले वाले से एक गिलास पानी मांगकर पीते हुए उन्होने उससे पूछा-क्यों भाई, क्या अब यहां पानी भी बिकने लगा है। ठेले वाले ने उसे अजीब से नजरों से देखकर कहा-लगता है किसी देहात से पहली बार शहर आये हो। अरे! बाबा जी यहां लोग अपना ईमान बेचने के लिए लाइन पर खड़े हैं और आप पानी की बात कर रहे है। इनका वश चले तो ये धरती, आकाश, हवा सब बेच खाये। पता नहीं इनका पेट, पेट है या पाप का घड़ा जो कभी भरता ही नहीं है। चाय ठेले वाला क्रोध से कांपते हुए कुछ और कहना चाह रहा था पर पुण्यात्मा ने उसे रोकते हुए कहा-बस भाई बस। मुझे बस इतना ही और बता दो कि क्या आजादी के बाद भी यहां कुछ नहीं बदला। ठेले वाले ने उसे घूरते हुए कहा-आप तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे कि आजादी की लड़ाई आपने भी लड़ी हो। अरे साहब! दो-चार महीने यहां रहकर खुद देख लीजिए, आपको सब पता चल जायेगा। बदला है तो सिर्फ लूटने वाले बदले हैं पहले गैरों ने लूटा अब स्वयं अपने ही देश को लूट रहे है। पहले गैरों ने खून बहाया अब भाई ही भाई का खून बहाने लगा है। किसी के पास अकूत दौलत है तो कोई दो जून की रोटी के लिए तरस रहा है। कितना गिनाऊं, जाओ भाई जाओ अपना रास्ता नापो। ये सब बताकर अपना ही दिल दुखाने के सिवा और कुछ नहीं होने वाला है। पुण्यात्मा का जी चाह रहा था कि चिल्ला-चिल्लाकर कहे कि हां हमने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। अपना खून-पसीना बहाया था। अपनी कुर्बानी दी थी। इसलिए नहीं कि अपने ही अपनों को लूटे बल्कि इसलिए कि हमारा देश खुशहाल हो। समाज मे समरसता का भाव हो । समाज अन्याय और शोषण से मुक्त हो। पर उन्हे मन मार के रह जाना पड़ा। यह सोचकर कि शायद मेरा यह सब कहना लोगो को नागवार गुजरे। सुनने वाले कहीं मुझे सिरफिरा न समझ ले। वे आंखें में आंसू भरे वहां से उठ कर आगे बढ़ गये। चलते-चलते वे रात के गहन अंधेरे में डूबे एक गांव में पहुंचे। गांव में पहुंचने का रास्ता इतना दुर्गम था जितना बेईमानों के बीच ईमानदारी का रहना। अभी चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। चारों तरफ से सायं-सायं की आवाज आ रही थी। दिनभर के थके हारे मजदूर-किसान अपने टूटे-फूटे झोपड़ों में बेसुध सोये हुए थे। तभी पुण्यात्मा को किसी बूढ़े की सिसक-सिसक कर रोने और लाठी की ठक-ठक की आवाज सुनाई दी। वे चैंक गये। अंधेरे में चलते हुए वे किसी खंभे से टकराते-टकराते बचे। तब तक लाठी की ठक-ठक की आवाज नजदीक आ गई थी। पुण्यात्मा ने देखा कि एक बूढ़ा आदमी बिल्कुल नजदीक में आकर उसे सहारा देते हुए खड़ा है। पुण्यात्मा ने उससे पूछा-आप कौन हैं भाई? और इस उमर में इतनी रात गये घर से बाहर क्यों निकल आये हैं? बुढ़े ने जवाब दिया-मैं भारत की आत्मा हूं, आजादी के बाद से अब तक खुशियों की रोशनी की तलाश में भटक रहा हूं। पुण्यात्मा ने कहा-भारत की आत्मा? मैं कुछ समझा नहीं, कृपया विस्तार से बताने की कृपा करें। बूढ़े ने कहा-पूज्य बापू कहा करते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। मैं इस देश का एक अभागा गांव हूं जहां अब तक खुशियों की रोशनी नहीं पहुंच पायी है। यहां अभी तक न स्वच्छ पेयजल की व्यस्था हो पायी है और न ही पक्की सड़के बन पाई है। सड़कें बनती भी है तो इतनी मुलायम जो राहगीर के पांव का वजन भी नहीं सह पाती। पहली बरसात के बूंदों से ही बहने लगती है। यहां शिक्षक विहीन पाठ शाला और डॉक्टर विहीन अस्पताल भर है। गांव वाले अब तक विकास का झुनझुना बजा रहे हैं। भाषण खा रहे है और आश्वासन पी रहे है। मैं आज तक गहन निराशा के अंधकर में डूबा हुआ हूं अब तक हर उम्मीद की एक किरण के तलाश में भटक रहा हूं। बूढ़े की करूण क्रंदन सुनकर पुण्यात्मा की आंखे नम हो गई और दिल फूट-फूटकर रोने लगा। अपनी नम आंखों को पूछते हुए पुण्यात्मा ने बूढ़े से पूछा- मगर अभी-अभी जिस खंभे से टकराते हुए मैं बड़ी मुश्किल से बचा वह क्या है? बूढ़े ने कहा- वह जनकल्याण्कारी योजनाओं के पोल है। पहले ढोल के अंदर पोल होता था अब तो पोल के अंदर ही भारी पोल है। सुबह आप देखेंगे कि ये सारे पोल भ्रष्ट्राचार के तारों से जुड़े हुए हैं। पोल पर बल्ब के स्थान पर फाइलें लटक रही है। जिससे देश के अंतिम आदमी के अंधेरे जीवन में रोशनी पहुंचाने का भ्रम पैदा होता है। हर पोल में हुक लगाकर तार खींचे गये है। जो किसी राजशाही, नौकरशाही, बाबूशाही और चमचाशाही के बंगले पर गया है। विकास की सारी रोशनी यहीं खींचे जा रहे है। देश के अंतिम आदमी के घर के पास लगे पोल पर आप चढ़कर टेस्टर से चेक करेंगे तो आपको पता लगेगा कि विकास की धारा यहां शून्य है। अंतिम आदमी लो वोल्टेज का शिकार है बाबू। उनकी खुशियों को भ्रष्ट्राचार का दानव लील रहा है। जब तक इस दानव का वध नहीं किया जायेगा तब तक गरीब के घर में विकास का राम नहीं आने वाला है, समझ गये। मेरी बातों पर विश्वास न हो तो सुबह का इंतजार करिये और सब कुछ अपनी आंखों से देख लीजिए। यह सब बताकर बूढ़ा जोर से रो पड़ा, पुण्यात्मा का सपना चकनाचूर हो चुका था। सुबह के इंतजार करने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। भरे मन से विदा लेना ही उन्हें उचित लगा। वे अविलंब लौटने लगे।

(साभार: रचनाकार)

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