बच गये ब्लैक फ्राइडे से

: योगिता पाठक

बीते कारोबारी सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन यानी 21 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार में अचानक उस वक्त हड़कंप मच गया, जब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक सेंसेक्स ने एक झटके में लगभग 1500 अंकों का गोता लगा दिया। ये सप्ताह शेयर बाजार के कारोबारियों के लिए काफी बुरा सप्ताह साबित हुआ। सप्ताह के पहले तीन दिनों में ही शेयर बाजार में 3.60 लाख करोड़ रुपये डूब चुके थे। ऐसे सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन को लेकर भी निवेशक सशंकित थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिल रहे संकेतों की वजह से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के सूचकांक निफ्टी दोनों ने ही अच्छी बढ़त के साथ कारोबार की शुरुआत की थी। लेकिन दोपहर होते ही बाजार अफवाहों की चपेट में आ गया और देखते ही देखते सेंसेक्स लगभग डेढ़ हजार अंक लुढ़क गया। ये 2016 में हुई नोटबंदी के बाद किसी एक कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार में हुई सबसे बड़ी गिरावट थी। इसके साथ ही देश में एक और ब्लैक फ्राइडे की आशंका ने निवेशकों और ब्रोकर्स के धड़कनों को असंतुलित कर दिया था। कुछ ही पलों में शेयर बाजार में निवेशकों के लगभग दो लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गये। राहत की बात यही रही कि बाजार के टूटते ही तत्काल भारतीय संस्थागत निवेशक सक्रिय हो गये। कुछ ही देर में शेयर बाजार ने आठ सौ से ज्यादा अंकों की मजबूती हासिल कर ली और अंत में सेंसेक्स महज 279 अंक की गिरावट के साथ बंद हुआ। भारत के शेयर बाजार में 21 सितंबर को जो कुछ भी हुआ, वह आगे कभी भी हो सकता है। कहने को तो शेयर बाजार का कारोबार कंपनियों की लाभ-हानी की स्थिति के आधार पर होता है। लेकिन सच्चाई ये है कि बाजार पर किसी भी कंपनी या समूह की लाभदेयता से ज्यादा सेंटिमेंट्स का काफी असर होता है। किसी भी खबर पर शेयर बाजार कभी भी अचानक धड़ाम हो सकता है, तो कोई सकारात्मक खबर बाजार में अचानक तेजी का माहौल बना भी देती है। शेयर बाजार की उतार-चढ़ाव का सबसे ज्यादा नुकसान छोटे निवेशकों को होता है, जो सूचकांक में होने वाली हलचल से प्रभावित होकर तुरंत ही अपना पैसा सुरक्षित करने की कोशिश में शेयर बेचने लगते हैं। कई बार भारी नुकसान से बचने के लिए शेयर पर स्टॉप लॉस लगाये जाने की वजह से भी ब्रोकर निवेशकों के शेयरों को एक निश्चित गिरावट के बाद खुद ही बेच देते हैं। मतलब साफ है कि अगर शेयर बाजार में अचानक गिरावट आती है, तो इससे सबसे अधिक छोटे या खुदरा निवेशक ही प्रभावित होते हैं। अमूमन बड़े या संस्थागत निवेशक तो भारी गिरावट की स्थिति में और शेयरों की खरीद कर अपनी लागत को समायोजित करने में सफल हो जाते हैं, लेकिन छोटे निवेशकों के लिए आमतौर पर ऐसा कर पाना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में अंततः उन्हें ही सबसे ज्यादा नुकसान का सामना करना पड़ता है। वास्तविकता तो ये है कि शेयर बाजार में एक बार जैसे ही नकारात्मक माहौल बनता है, कारोबार पर मंदड़िए हावी हो जाते हैं और सूचकांक तेजी से गिरने लगता है। 21 सितंबर को भी शेयर बाजार मुख्य रूप से यस बैंक के प्रशासनिक संकट और आईएलएंडएफसी के वित्तीय संकट की खबरों की वजह से प्रभावित हुआ था। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा यस बैंक पर कड़ाई करने और आईएलएंडएफसी की नकारात्मक खबर ने शेयर बाजार में ऐसा ही नकारात्मक माहौल बना दिया था। यदि समय रहते भारतीय संस्थागत निवेशक सक्रिय नहीं हुए होते, तो 21 सितंबर का दिन भी शेयर बाजार के लिए कुख्यात ब्लैक फ्राईडे की एक और तारीख के रूप में शुमार हो जाता। इस दिन भारतीय शेयर बाजार में जो कुछ हुआ, वह छोटे निवेशकों और फटका सौदा (इंट्रा-डे ट्रेडिंग) करने वाले कारोबारियों के लिए एक सबक है कि अगर उन्होंने बिना सोचे समझे खुद को बाजार के सेंटीमेंट्स के आधार पर बहने दिया, तो उन्हें कभी भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। शेयर बाजार अगर अमीर बनाता है, तो एक झटके में कंगाल भी बना देता है। इसलिए उन लोगों को शेयर बाजार से हमेशा दूर रहना चाहिए, जो बिना किसी शोध के ही ब्रोकिंग फर्म्स की सलाह पर किसी भी कंपनी के शेयर में पैसा लगाते हैं। शेयर बाजार का कारोबार इतना अनिश्चित होता है कि कई बार पहले से कंपनियों के बारे में शोध करने के बाद भी सिर्फ नकारात्मक खबरों या अफवाह से ही निवेशकों को भारी चपत लग जाती है। इसलिए शेयर बाजार में कारोबार करने वाले छोटे निवेशकों को यह मानकर चलना चाहिए कि यदि वे बाजार में टिकने का धैर्य नहीं दिखाएंगे और तुरत-फुरत में सौदा करना चाहेंगे, तो शेयर बाजार उन्हें कभी भी कंगाली की हालत में ला सकता है।

This post has already been read 44899 times!

Sharing this

Related posts

Leave a Comment