न मुलाकात हो और न ही बात हो

: अनुराग साहू

भारत को अब अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान उस दुम की तरह है, जो कभी सीधी नहीं होती। भारत बार-बार शांति प्रयासों के तहत उससे बातचीत करने का मन बनाता है, लेकिन हर बार पाकिस्तान भारत के साथ छल का ही सहारा लेता है। पाकिस्तान बार-बार विश्वासघात करता है, अपने वायदों से मुकरता है और फिर बातचीत की विफलता का दोष भी भारत पर ही मढ़ने की कोशिश करता है। ताजा मामला पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गये पत्र के बाद शुरू हुआ है। अपने पत्र के जरिये इमरान खान ने भारत के साथ एक बार फिर बातचीत की शुरुआत करने की इच्छा जतायी है। उनका कहना है की बातचीत से सभी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। इसलिए दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत होनी चाहिए। फौरी तौर पर देखा जाये, तो इमरान खान के इस प्रस्ताव को स्वागत योग्य माना जाना चाहिए। यही वजह है कि भारत सरकार ने भी अपनी ओर से सकारात्मक रुख अपनाते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से इतर दोनों देशों के विदेश मंत्रियो के बीच बातचीत होने की बात स्वीकार भी कर ली थी। लेकिन अगले ही दिन पाकिस्तान की हरकतों की वजह से भारत को विदेश मंत्रियों के बीच होने वाली बातचीत को रद्द करना पड़ा। आजादी के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच जैसी कड़वाहट बनी हुई है, वह दोनों ही देशों के लिए अच्छी नहीं है। भारत और पाकिस्तान दोनों के रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा एक-दूसरे के मुकाबले की तैयारी करने में ही खर्च हो जाता है। इसलिए अगर दोनों देशों के बीच समस्याओं का समाधान हो सके, तो इससे अच्छा और कुछ भी नहीं हो सकता है। लेकिन पाकिस्तान हमेशा ही इस विषय को लेकर दोतरफा चाल चलता है। वो भारत के साथ वार्ता का प्रस्ताव कर विश्व समुदाय के सामने तो खुद को बातचीत के जरिये समस्याओं का समाधान करने का इच्छुक दिखाता है। दूसरी ओर भारत को आतंकी गतिविधियों के जरिये अस्थिर करने की भी कोशिश करते रहता है। इस बार भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पहले की तरह ही एक बार फिर भारत के साथ ही पूरे विश्व समुदाय को भुलावे में रखते हुए अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश की है। पहले भी जब कभी भारत ने आगे बढ़कर बातचीत के जरिये दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की कोशिश की, तब पाकिस्तान ने पीठ पर वार करने की नीति अपनायी है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संबंधों को सुधारने के लिए अपनी ओर से पहल करते हुए बस से लाहौर गये थे। उस समय लग रहा था कि दोनों देशों के संबंध सुधर जायेंगे, लेकिन जवाब में पाकिस्तान ने भारत पर कारगिल का युद्ध थोप दिया। इसी तरह मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहले अपने शपथग्रहण में नवाज शरीफ को आमंत्रित किया और फिर काबुल के दौर से लौटते वक्त लाहौर जाकर नवाज शरीफ से मुलाकात कर संबंध सुधारने की पहल की थी। लेकिन इसका जवाब पाकिस्तान ने पठानकोट और उरी हमले के रूप में दिया। उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेता सख्त लहजे में कहा था कि बातचीत और आतंकवाद साथ साथ नहीं चल सकती। अगर बातचीत जारी रखनी है तो पाकिस्तान को अपनी ओर से आतंकवाद पर लगाम लगाना ही होगा। स्थिति अभी भी बदली नहीं है। इधर इमरान खान ने नरेंद्र मोदी को पत्र भेजा, उधर पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसकर बीएसएफ के जवान नरेंद्र सिंह की निर्मम हत्या कर दी। न केवल उनके सिर में गोली मारी गयी, बल्कि उनका गला भी रेत दिया गया। इतना ही नहीं पाकिस्तान ने कश्मीर में सक्रिय रहे और सुरक्षाकर्मियों के साथ मुठभेड़ में मारे गये आतंकियों को शहीद बताते हुए बीस डाक टिकट जारी कर दिया। पाकिस्तान की ये हरकतें बातचीत शुरू करने की दृष्टि से तो कतई मुफीद नहीं मानी जा सकतीं। इसी वजह से विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने के बावजूद भारत सरकार को इस प्रस्तावित मुलाकात को रद्द करने का फैसला लेना पड़ा। सच्चाई तो यह है कि आजादी के बाद से ही दोनों देशों के रिश्ते में पाकिस्तान छल-प्रपंच और विश्वासघात का सहारा लेता रहा है। आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पाकिस्तान ने आज तक अपनी ओर से कोई भी सार्थक कदम नहीं उठाया है। और तो और भारत द्वारा पाकिस्तान को आतंकवादियों की सूची सौंपने और भारत में आतंकी गतिविधियों में उनकी संलिप्तता का सबूत देने के बावजूद अभी तक उनके खिलाफ पाकिस्तान में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। आतंकवादियों को पोषित करने की अपनी नीति से पाकिस्तान बाज आने वाला नहीं है। माना जाता है कि इमरान खान पाकिस्तानी सेना के समर्थन से ही वहां की सत्ता पर काबिज हो सके हैं। और पाकिस्तानी सेना कभी भी भारत के साथ संबंध सुधारने की पक्षधर नहीं रही है। यह ठीक है कि दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार होना चाहिए। भारत चाहकर भी अपना पड़ोसी नहीं बदल सकता है। आदर्श स्थिति तो यही होनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच संबंध मधुर हों, लेकिन संबंधों को मधुर रखने की जिम्मेदारी जितनी भारत की है, उतनी ही पाकिस्तान की भी है। और जब तक वो आतंकी गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाता, तब तक दोनों देशों के रिश्ते कभी भी सामान्य नहीं हो सकते हैं। विडंबना तो यह है कि इमरान खान ने विदेश मंत्रियों की बातचीत का जो प्रस्ताव दिया है, वह भी कोई स्वतःस्फूर्त प्रस्ताव नहीं है। इमरान के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें जो बधाई का संदेश भेजा था, उसके जवाब में इमरान खान ने दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव दिया है। बधाई संदेश का जवाब देना एक औपचारिक बात है, लेकिन इस औपचारिकता को निभाने में भी उनको महीने भर का समय लग गया। बेहतर तो ये होता कि वे अपनी ओर से स्वतःस्फूर्त प्रस्ताव भेजते और दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने के लिए ठोस पहल करते। हो तो ये रहा है कि पाकिस्तान न केवल आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने में लगा है, मुठभेड़ में मारे जाने वाले बुरहान वाली जैसे आतंकियों को शहीद बताते हुए उनके डाक टिकट जारी कर रहा है। इस क्रम में यह कहना भी उचित होगा कि दोनों देशों के बीच बातचीत तब तक शुरू नहीं की जानी चाहिए, जब तक कि पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाने का वचन न दे। क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो पाकिस्तान आगे भी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहेगा, भारत में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश करता रहेगा और हम उससे सदाशयता की आशा करते हुए बातचीत करना जारी रखेंगे। होना तो यह चाहिए कि पहले पाकिस्तान आतंकवादी गतिविधियों पर लगाम लगाये। इसके बाद ही सौहार्दपूर्ण माहौल में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हो और तमाम कड़वाहटों को दूर करने की कोशिश की जाये। लेकिन जब तक पाकिस्तान आतंकवादी गतिविधियों पर रोक नहीं लगाता है, तब तक उसके साथ द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत करने का कोई तुक नहीं है।

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