झारखंड की एक ऐसी जगह जहां नमक से होती है देवी पूजा’

रांची। ’झारखंड’ के संताल परगना में एक जगह ऐसी है, जहां नमक की देवी की नमक से पूजा होती है. देवी को प्रसाद में नमक और बताशे चढाये जाते हैं. यही देवी का भोग है. नमक का भोग चढ़ाने दूर-दूर से लोग आते हैं. बिहार और पश्चिम बंगाल से भी. यहां मेला भी लगता है. यह ’नुनबिल मेला’ के नाम से सरकारी और ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है. यह मेला मकर संक्रांति के ठीक दूसरे दिन शुरू होता है और आठ दिनों तक चलता है. इन्हीं आठ दिनों में नमक की देवी की यहां पूजा होती है. यह मेला झारखंड के दुमका जिले के मसलिया अंचल कार्यालय से छह मील दूर दक्षिण दिशा में दलाही गांव में एक छोटी-सी नदी के तट पर लगता है. इस देवी और नदी के नाम भी ’नुनबिल’ हैं – ’’नुनबिलबुढ़ी’, ’नुनबिल नदी’’. ’नुनबिल’ में दो शब्दों का योग है- ’’नून’’ यानी नमक और ’’बिल’’ यानी बिला जाना, गायब हो जाना. यह पारिस्थितिकीय मानवशास्त्रीय दृष्टि से लघु परंपरा का अनोखा तत्व है. यहाँ लघु परंपरा की सार्वभौमिकता और दीर्घ परंपरा के सन्कुचितीकरण ’ ’ के संकुल की पारिस्थितिकीय संरचना अद्भुत है. यहां नमक की देवी की नमक से पूजा की परंपरा कितनी पुरानी है, इसकी ठीक-ठीक जानकारी किसी को नहीं है. मान्यता है कि है कि यह पूजा पांच सौ साल पहले शुरू हुई थी. 1910 में प्रकाशित एसएसएल ओ’मैली के ’बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संथाल परगना’ के मुताबिक सन 1900 के बहुत साल पहले भी यह पूजा प्रचलन में थी और उस स्थान पर तब भी मेला लगता था. तब नुनबिल मेले की लोकप्रियता बासुकिनाथ श्रावणी मेले से भी ज्यादा थी और उससे भी ज्यादा भीड़ यहां जुटती थी। प्रोसिडिंग ऑफ द रॉयल आयरिश एकेडमी, 1893 (पेज-166) के मुताबिक इस मेले में एक लाख लोग जुटते थे, जबकि संताल परगना के दूसरे शीतकालीन मेलों में तब बहुत मामूली भीड़ जुटती थी. तब नुनबिल मेला दिसंबर में लगता था. उस समय यहां शाल का एक विशाल पेड़ था और लोगों की मान्यता थी कि नुनबिल देवी का वास इसी पेड़ में है. बाद के वर्षों में यह मेला जनवरी में मकर संक्रांति के ठीक दूसरे दिन से लगने लगा. आरएम दास के मेनू ऑन क्राइम एंड पनिशमेंट (पेज 125) के मुताबिक 1907-08 से 1935-36 तक जितनी भीड़ बासुकिनाथ मेले में जुटी थी, उतने ही लोग नुनबिल मेले में भी पहुंचे थे. जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (1891, खंड 59, पेज 233) और पीसी राय चौधरी के बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर: संताल परगना (1957, खंड 13, पेज 302) भी इस बात के साक्ष्य देते हैं कि नुनबिल मेला संताल परगना का अत्यंत प्रमुख मेला था. सेंसस ऑफ इंडिया (1961, बिहार, पेज 26) में यह पहाडि़या आदिवासी मेले के रूप में दर्ज है, जो माघ महीने में लगता था। संताल परगना में मकर संक्रांति पर और उसके बाद कई स्थानों पर मेले लगते हैं. कई मेले गर्म जलकुंडों और जलस्रोतों के निकट भी लगते हैं. वहां भी लोकदेवियों की सालाना पूजा की परंपरा है और वहां के पुजारी भी आदिवासी समाज के हैं. वहां आदिवासी और गैर आदिवासी, दोनों समुदाय के लोग जुटते हैं. दोनों की मान्यताओं और आस्था का स्वरूप समान है, लेकिन कहीं भी नमक से देवी की पूजा नहीं होती. नमक से पूजा की प्रथा केवल नुनबिल मेले में ही है. पाकुड जिले के पाकुडि़या प्रखंड के सीतापुर में मकर संक्रांति पर एक दिन का और लिट्टीपाड़ा प्रखंड के नावाडीह में दस दिनों का मेला लगता है. दोनों स्थानों पर गर्मजल के स्रोत (कुंड) हैं. दुमका जिले के जामा अंचल के बारापलासी में नदी के तट पर मकर संक्रांति के दिन तातलोई मेला लगता है. यहां भी गर्मजल कुंड है. गोड्डा जिले में पोड़ैयाहाट-हंसडीहा मार्ग पर कठौन से पांच किमी पश्चिम नीमकर गांव में मकर संक्रांति मेला लगता है. यहां गर्मजल कुंड और नीमकर तालाब है. यहां ’निहरनी माई’ की पूजा होती है. इस मेले और यहां की लोकदेवी के विषय में भी कई दंतकथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। ’जामताड़ा’ जिले के नारायणपुर अंचल में मकर संक्रांति पर 15 दिनों का मेला लगता है. यहां 1907 से दुखिया बाबा की पूजा होती है. दुखिया बाबा को लेकर भी कई दंतकथाएं हैं. देवघर जिले में अजय नदी और पतरो नदी के मुहाने पर दो मुहानी मेला भी मकर संक्रांति के अवसर पर लगता है. इसी नदी के किनारे देवघर-सारठ पथ पर चारमारा घाट पर जियाखाड़ा मेला लगता है. जियाखड़ा मेले में जियामाता की पूजा होती है. जियामाता भी लोकदेवी हैं और उनको लेकर भी कई मान्यताएं हैं. इन सभी मेलों में आदिवासी समाज के लोग भी जुटते हैं. सीतापुर, तातलोई, नीमकर और नावाडीह आदि मेलों में तो संताल सफाहोड़ संप्रदाय के लोग भी आते हैं. इन सभी गर्मजल कुंडों को लेकर यही मान्यता है कि उनमें स्नान करने से चर्म रोग दूर होता है.

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