किसान पर देना होगा पूरे देश को ध्यान

: सियाराम पांडेय ‘शांत’

2019 का लोकसभा चुनाव सिर पर है। इसे देखते हुए राजनीतिक दलों की आम जन के बीच आमदरफ्त तेज हो गई है। जनता को लुभाने के लिए अनेक वादे किए जा रहे हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोपों-प्रत्यारोपों के गोले दाग रहेत्तापक्ष को नाकारा साबित करने में जहां पूरा विपक्ष जुटा है, वहीं सत्ता पक्ष भी कुछ कम संघातक गोले नहीं फेंक रहा है। राहुल गांधी ने अगर मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर के किसानों का कर्जमाफ करने का दावा किया है तो बीजेपी ने भी उसके किसान हितैषी होने पर सवाल उठाया है। वह कांग्रेस को 2009 की तरह खुलकर खोलने नहीं देना चाहती। तत्कालीन मनमोहना सरकार ने किसानों का कर्जमाफी का लालीपॉप देकर चुनाव अपनपे पक्ष में कर लिया था। वही प्रयोग वह राजस्थान, मध्यप्रदेश और दत्तीसगढ़् में इसी साल होने वाले चुनाव में दोहरानी चाहती है। 2019 में सत्ता में वापसी का दबाव तो उस पर है ही। हालांकि इसके लिए उसने कुछ बड़े आरोपों के गोले भी सरकार पर दागे हैं, लेकिन यह सब पूरी तरह जनता पर निर्भर करता है कि वह इसे किस रूप में लेगी? वैसे भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लोग गंभीरता से नहीं लेते। इसके पीछे उनकी खिलंदड़ी हरकतें ही बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। अपने भोपाल के रोड शो में भी उन्होंने आंख मारने का संसद जैसा प्रयोग दोहराया, तिहराया। इससे छवि खराब होती है। केवल जनेऊ पहन लेने से, मंदिर में चले जाने से कोई हिंदू नहीं हो जाता। तमाम हिंदू मस्जिदों, दरगाहों और गिरिजाघरों में जाते हैं और श्रद्धा से नमन करते हैं तो क्या वे उस धर्म के हो जाते हैं। संघ और बीजेपी की जुगलबंदी पर जितनी बेहतरीन स्पष्टीकरण संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिया है, उससे विपक्ष का खेल गड़बड़ा गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की राजनीतिक योग्यता और दक्षता पर बीजेपी निरंतर सवाल उठाती रही है। मिर्च पैदा करने वाले उनके बयान पर बीजेपी ने कभी उनके पिता राजीव गांधी पर भी सवाल उठाया था। जिसने खेती नहीं की है, वह किताबी ज्ञान से ही काम चलाएगा। सभी आद्य शंकराचार्य तो नहीं हो सकते कि काम कला का ज्ञान प्राप्त करने के लिए परकाया प्रवेश विद्या का इस्तेमाल करें। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संदेह जताया है कि राहुल गांधी को रबी व खरीफ की फसल का समय भी पता होगा। कांग्रेस जिस तरह से किसानों के मुद्दे उछाल रही है। देश भर के किसानों के कर्ज माफ करने के आश्वासन दे रही है, उसे देखते हुए अमित शाह की चुटकी स्वाभाविक भी है। यह सच है कि किसानों का दर्द केवल किसान ही जान सकता है। राहुल गांधी ने कभी खेती नहीं की। उनके परिवार ने कभी खेती नहीं की लेकिन अमित शाह ने खेती की है, यह वे किस दावे पर कह सकते हैं। उन्होंने व्यापार किया है और आज भी राजनीति उनके और कांग्रेस दोनों के लिए व्यापार ही है। जो भी राजनीतिक दल सियासत से जुड़े हैं, लोकहित तो उनके लिए बहाना है, दरअसल वे सभी व्यापार ही कर रहे हैं। कांग्रेस किसानों का हित नहीं कर सकती, अमित शाह की इस राय में दम हो सकता है लेकिन बीजेपी किसानों का हित कैसे करेगी, इसका रोडमैप क्या है? बाढ़ से तकरीबन आधे देश का किसान तबाह हो गया है। अब बरसात नहीं हो रही है। आवारा बादलों का आकाश में पता ही नहीं चल रहा है कि किधर चले गए। बाढ़ से जिन किसानों की फसल बची थी, वह भी सूख रही है। किसान ट्यूबवेल चलाकर अपनी फसल बचा सकता है लेकिन डीजल इतना महंगा है कि वह फसलों की सिंचाई करे भी तो किस तरह? कांग्रेस कह रही है कि वही उनकी रक्षा कर सकती है। बीजेपी कह रही है कि वही रक्षा कर सकती है। किसानों का रक्षक कौन है, यह पता ही नहीं चल रहा है। बड़ी असमंजस की स्थिति है। कोई नेता किसानों की सभा में बोलेगा तो उसे किसानों के दिल की बात कहनी होगी। व्यापारियों के बीच व्यापारियों की भाषा बोलनी होगी फिर नेता तो मानव मन का विज्ञान जानता है। ‘जब जैसा तब तैसा, न जाने तो नेता कैसा?’ अमित शाह ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री मोदी के नारे चुनावी नारे नहीं होते। हमें उन्हें हकीकत में बदलना आता है। यह अच्छी बात है। नेताओं को अपने वादे पर दृढ़ रहना चाहिए लेकिन वादों की पूर्णता का ख्याल चुनावी वर्ष में ही क्यों आता है, विचार तो इस पर भी होना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि सरकार बनने के दिन से बीजेपी विकास की रणनीति बना रही है, उसे अंजाम दे रही है लेकिन विकास की गति क्या है? उस पर भी तो सोचना होगा। अमित शाह का आरोप है कि कांग्रेस न तो देश और न ही इसके किसानों के हितों की रक्षा कर सकती है क्योंकि वह जय जवान, जय किसान के नारे को लागू करने में विफल रही है। किसानों की आय दोगुना करने का प्रयास केवल बीजेपी कर सकती है। पहली बात तो यह कि किसानों की आय कितनी है और अगर वह दोगुना हो भी गई तो उससे किसानों का क्या भला होगा। महंगाई जिस गति से बढ़ रही है, उससे तो किसान की कमर ही टूट जाएगी। किसानों के हित को लेकर हड़बड़ी में नहीं, पूरे धैर्य और विवेक के साथ निर्णय लेने की जरूरत है। कुछ लोगों को लगता है कि कर्जमाफी से किसानों का दुख दूर हो जाएगा लेकिन सच तो यह है कि इससे उसे फौरी राहत ही मिलेगी। किसानों की समस्याओं की जड़ पर प्रहार करना होगा। खेती को उद्योग का दर्जा देना होगा। किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करे, इससे बात नहीं बनेगी। इसमें संदेह नहीं कि नरेंद्ग मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ने किसानों के हितों के लिए काम किया है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड व रबी व खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढोतरी आदि इसके प्रमाण हैं। बीजेपी अध्यक्ष कह रहे हैं कि किसानों के साथ खड़ा रहना बीजेपी की आदत है। बीजेपी सरकार किसानों के लिए समर्पित है । केवल साथ खड़े रहने और समर्पण भर से बात नहीं बनने वाली। किसानों के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। संत कबीरदास ने बड़े पते की बात कही है कि राम कहै दुनिया गति पावै, खांड़ कहै मुख मीठा। जिस तररह खांड़ कहने से मुंह मीठा नहीं हो सकता, उसी तरह किसान-किसान चिल् लाने भर से किसानों का भला होने वाला नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने अलग आदिवासी मामलात मंत्रालय बनाया। मोदी सरकार ने भी आदिवासियों के हितों के लिए अनेक कदम उठाए हैं। देर-बबेर उसके नतीजे भी दिखेंंगे लेकिन किसानों को लेकर, खेंतिहर मजदूरों को लेकर गंभीर तो होना ही पड़ेगा। कर्जमाफी समस्या का निदान नहीं है लेकिन सरकार यह तो सुनिश्चित कराए कि किसानों की कृषि योग्य जमीनों का बेवजह अधिग्रहण न हो। जिस तरह जोत घट रही है, उस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। किसानों की जमीन बिल्डर खरीद रहे हैं। गांव कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रहे हैं। गांव ही नहीं बचेंगे, जमीन ही नहीं बचेगी तो क्या करेंगे किसान? किसान के पास तो खड़ा होने के लिए अपनी जमीन भी नहीं बचेगी तो बीजेपीई कहां खड़ा होंगे? कांग्रेसी कहां खड़े होंगे या किसानों के हमदर्द राजनीतिक दल कहां खड़े होंगे। जहां भी वे खड़े होंगे, वह जमीन उधार की होगी, किसान की नहीं। इसलिए अब भी समय है कि सरकार किसानों की समस्याओं पर अविलंब सोचे और रणनीति बनाकर उनका उत्थान करे।

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