अंग्रेजी की शरण में गया देश का सबसे पुराना हिंदी प्रकाशन

नई दिल्ली। देश के सबसे पुराने और अहम प्रकाशन संस्‍थानों में से एक हिंद पॉकेट बुक्स का अधिग्रहण अंग्रेजी के प्रकाशन संस्थान पीआरएच (पेंग्विन रैंडम हाउस) ने कर लिया है। यह खबर इसलिए चर्चा का विषय है कि 1958 में जिस हिंद पॉकेट बुक्स प्रकाशन संस्‍थान की शुरुआत हिंदी भाषा के विकास, उत्‍थान करने के मकसद से हुई थी, उसका अधिग्रहण एक अंग्रेजी प्रकाशन संस्‍थान ने किया है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि यह सौदा कितने में तय हुआ है, लेकिन इसे पेंगुइन के हिंदी साहित्य प्रकाशन की ओर बढ़ते कदम के तौर पर देखा जा रहा है। 2005 में पेंगुइन प्रकाशन संस्‍थान ने अपना हिंदी प्रकाशन कार्यक्रम भी शुरू किया था। हिंद पॉकेट बुक्स प्रकाशन से हिंदी के प्रसिद्ध लेखकों की कितनी ही कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें आचार्य चतुरसेन, गुलशन नंदा, नरेन्द्र कोहली, खुशवंत सिंह, अमृता प्रीतम, शिवानी, तेजपाल सिंह धामा, मधु धामा और आर के नारायण जैसे लेखकों के नाम शामिल हैं। यहां प्रकाशित पुस्तकों ने कई अहम पुरस्कार भी हासिल क‌िए हैं। हिंदी के विकास में ‌इसके महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि 1958 में जब हिंद पॉकेट बुक्स की स्थापना हुई थी, तब इसने कम कीमत में लेखकों की किताबें प्रकाशित कर सबको चौंका दिया था। गौरतलब है कि बीते वर्ष दिसंबर में हिंद पॉकेट बुक्स के संस्‍थापक दीनानाथ मल्होत्रा की मृत्यु हो गई। इसके करीब सात महीने बाद इसका अधिग्रहण कई सवाल खड़े करता है। हिंद पॉकेट बुक्स हिंदी और उर्दू की किताबों को प्रकाशित करने का अग्रणी संस्‍थान रहा है और इसे एक सफल प्रकाशन संस्‍थान के तौर पर जाना जाता रहा है। 1959 में पहली बार हिंदी में दस पेपरबैक का एक सैट प्रकाशित हुआ था, जो इसकी सफलता की ओर बढ़ाया हुआ पहला कदम साबित हुआ। तब से साहित्य, कविता, जीवनी आदि उच्चकोटि का साहित्य और अहम अनुवाद प्रकाशित होते रहे हैं।
भाषा को विस्तारित करने वाला कदम
इस अधिग्रहण के संबंध में पीआरएच ने अपनी साईट पर अधिकारिक तौर पर इस अधिग्रहण की पुष्टि करते हुए कहा है कि यह अधिग्रहण हमारी स्थानीय भाषा प्रकाशन को विस्तारित करने के लिए हमारी प्रति‌बद्धता का प्रतिनिधित्व करता है और प्रकाशन व पाठक बढ़ाने के लिए हमारी वचनबद्धता और जुनून को दोहराता है।
विरासत सौंपने का विकल्प
वहीं हिंद पॉकेट बुक्स के प्रबंध निदेशक रहे शेखर मल्होत्रा ने कहा, हमारी कंपनी ने इसलिए पेंगुइन रैंडम हाउस ‌इंडिया को अपनी विरासत सौंपने का विकल्प चुना है कि वह हिंदी साहित्य और कला की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाएगी।

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